सोशल मीडिया के उदय के साथ ही देश-विदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है. अरब या जैस्मीन क्रांति के बाद, कई अरब देशों मेंसत्ता परिवर्तन हुए. जैस्मीन क्रांति के पीछे सोशल मीडिया की एक बड़ी ताकत रही है. मिस्र में 2010 में एक बड़ी क्रांति हुई थी जिसकी शुरूआत तहरीर चौक से हुई. इसके बाद, तत्कालीन राष्ट्रपति और तानाशाह हुस्नी मुबारक को अपना पद छोड़ना पड़ा था.

गूगल के एक कर्मचारी वाएल घोनिम ने फेसबुक पर एक पेज बनाया था. इस पेज का नाम 'हम सब खालिद हैं' था. दरअसल घोनिम की नजर खालिद नाम के एक शख्स की लाश की तस्वीर पर गई. उसके शरीर पर पुलिस की पिटाई के निशान थे. खालिद को मिस्र की पुलिस ने पीट पीटकर मार दिया था.

घोनिम ने उस पेज पर खालिद की तस्वीर शेयर की और अपना गुस्सा जताया. तीन दिनों के भीतर घोनिम के पेज पर 1 लाख से ज्यादा लोग जुट गए. धीरे धीरे करके यह पेज अरब जगत में सबसे ज्यादा फॉलोअर वाला देश बन गया. इतने बड़े स्तर पर लोकप्रिय होने के बाद थोड़ी मुश्किलें तो आनी हीं थीं. ऐसे में घोनिम को मिस्र की सुरक्षा एजेंसियों ने गिरफ्तार कर लिया. घोनिम को मारा गया, पीटा गया और नजरबंद कर दिया गया लेकिन घोनिम के रिहाई के बाद तीन दिनों के भीतर उनके पेज की बदौलत ही लाखों लोग मिस्र में सड़कों पर उतरे. विपक्षी नेता भी सड़कों पर आए गए और 30 साल से सत्ता पर काबिज हुस्नी मुबारक को आखिरकार अपना पद छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा.

सोशल मीडिया ने एक देश में सत्ता परिवर्तन करवा दिया. भारत में सोशल मीडिया और बीजेपी करीब करीब एक साथ आगे बढ़े हैं. 2004 और 2009 के दो लगातार चुनाव हारने के बाद बीजेपी हाशिए पर थी. अन्ना आंदोलन, निर्भया कांड के बाद आंदोलन में सोशल मीडिया की एक भूमिका थी, लेकिन 2014 के चुनाव तक यह पूरी तरह प्रभाव में आ चुका था. दो आंदोलनों के बाद बीजेपी के पास पीएम के तौर पर नरेंद्र मोदी के तौर पर एक हिंदुत्ववादी और गुजरात मॉडल वाले विकासवादी व्यक्तित्व का नेतृत्व था. उनकी अलग-अलग छवियों को सोशल मीडिया के जरिए खासा भुनाया गया, युवाओं को जोड़ा गया.

सोशल मीडिया के उस दौर में हालत यह थी कि लोग जो भी नेट पर पढ़ते-देखते थे, सच ही मानते थे. तब न तो लोग खुद फैक्ट चेक करते थे और न ही जनता खुद भी रिसर्च करना पसंद करती थी. उन दिनों पीएम मोदी की एक तस्वीर खासी वायरल हुई थी जिसमें वो झाड़ू लगाते हुए नजर आ रहे थे. उस फोटों के जरिए उनकी सादगी भरी छवि को खासा फैलाया गया. बाद में पता चला कि वो तस्वीर फोटोशॉप थी. नरेंद्र मोदी का उससे कोई संबंध नहीं था.

बीजेपी की खासियत यह थी कि 2 चुनाव हारने के बाद और सोशल मीडिया के बेहतरीन इस्तेमाल के बावजूद वो सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करते थे. उन्होंने सैन्य मुद्दों पर अपनी राय हमेशा इस तरह से रखी कि उन्हें देशद्रोही कभी नहीं कहा गया. अन्ना आंदोलन और निर्भया आंदोलन को कभी भी बीजेपी का आंदोलन नहीं बताया गया और बीजेपी ने इनसे खुद को दूर रखते हुए भी इनका फायदा उठाया. सत्ता में आने के बाद भी बीजेपी ग्राउंड और सोशल मीडिया दोनों जगह मजबूत रही.

दूसरी तरफ कांग्रेस है. पार्टी प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कल प्रेस कॉन्फ्रेंस में रसोई गैस का सिलेंडर रख लिया. थोड़ी बहुत चर्चा भी हुई. राहुल गांधी और बाकी कांग्रेसी नेता भी सोशल मीडिया भी सरकार पर हमलावर रहते हैं. लेकिन जमीन पर कोई दिखाई नहीं पड़ता. भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का कैडर मानो खत्म सा हो चुका है. एक समय सेकुलर छवि बनाकर रहने वाली पार्टी, आज प्रियंका गांधी के मंदिर जाने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करती है.

कांग्रेस को छोड़िए तो बाकी विपक्षी पार्टियों का भी यही हाल है. यूपी में बीएसपी प्रमुख मायावती और एसपी प्रमुख अखिलेश यादव भी जमीन से ज्यादा ट्विटर पर ही रहते हैं. बिहार में तेजस्वी यादव का भी कमोबेश यही हाल है. ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या सोशल मीडिया ने आंदोलनों की भागीदारी को संकीर्ण कर दिया है? ऐसा लगता है कि लोग एक ट्वीट कर देने भर से खुद के दायित्व की पूर्ति कर लेते हैं. बीते दिनों में अगर आप देखेंगे तो सोशल मीडिया पर ही सरकार के खिलाफ लिखकर मशहूर हुई एक नई कौम पैदा हो चुकी है. ये लोग कभी भी सड़क पर नजर नहीं आते. महज सोशल मी़डिया पर लिखते हैं और बाकी लोग भी इन्हें क्रांतिकारी की तरह देखते हैं. एक ऐसे दौर में जब पैसे देकर ट्विटर पर हैशटैग चलवाए जाते हों तो ऑनलाइन क्रांति से क्या उम्मीद की जा सकती है.

मिस्र की क्रांति को खड़ा करने वाले वाएल घोनिम भी सोशल मीडिया को लेकर अब अपनी राय बदल चुके हैं. वो कहते हैं "हमें पता नहीं है कि अफवाहों को कैसे नियंत्रित किया जाए. लोगों के पक्षपातपूर्ण विचार को सच बताने वाली अफवाहों पर न केवल यकीन किया जा रहा है, बल्कि यह लाखों लोगों में फैल भी रही है. दूसरी बात, हम ऐसे लोगों से ही बात करना चाहते हैं, जो हमसे सहमत हों और सोशल मीडिया की मेहरबानी से हम लोगों को चुप करा सकते हैं, उन्हें अनफॉलो कर सकते हैं या फिर प्रतिबंधित कर सकते हैं. तीसरी बात, ऑनलाइन विमर्श जल्द ही उन्माद में बदल जाता है, और ऐसा करते हुए हम शायद भूल जाते हैं कि स्क्रीन के पीछे बैठे लोग सचमुच में इंसान हैं, न कि कोई अवतार. चौथी बात, अपने विचार को बदलना वाकई कठिन हो गया है.

सोशल मीडिया की गति और उसके साहस के कारण हम जल्द ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए बाध्य हो जाते हैं और दुनिया के जटिल मसलों पर भी सिर्फ 140 कैरेक्टर में अपने तीखे विचार व्यक्त कर डालते हैं. और जब हम एक बार ऐसा करते हैं, तो यह सदा के लिए इंटरनेट पर दर्ज हो जाता है. घोनिम कहते हैं कि पांचवी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सोशल मीडिया कुछ इस तरह हो गया है कि इसमें दोतरफा संवाद के बजाय एकालाप, विमर्श की जगह पोस्ट और गहरे संवाद की जगह खोखली टिप्पणियों ने ले ली है. यह सब ऐसा है, मानो हम इस बात पर सहमत हैं कि हम यहां सिर्फ अपनी बात कहने के लिए हैं, एक दूसरे से बात करने के लिए नहीं".

बेशक आज के दौर में सोशल मीडिया की समाज में एक अहम भूमिका है लेकिन सोशल मीडिया ने हम सभी को शायद बहुत ज्यादा बनावटी, जजमेंटल और उन्मादी बना दिया है. सबसे बड़ी बात है कि हमारे विपक्षी नेता तो इस बात को भूल ही चुके हैं कि ट्विटर और फेसबुक के बाहर भी कोई दुनिया है. बेशक यह हमारे नेताओं का निकम्मापन भी है लेकिन जिस तरह से सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी लोग नजर आते हैं लेकिन असल में विलुप्त हो जाते हैं तो यही लगता है कि आज के दौर में आंदोलन खड़ा करना आजादी के लिए किए गए आंदोलनों से मुश्किल हो चुका है. गांधी जी के लिए भी शायद आज के दौर में आंदोलन खड़ा करना ज़्यादा मुश्किल होता.