हाथरस के कथित गैंगरेप केस में सीबीआई जांच का आदेश हो गया है. आने वाले दिनों में सीबीआई इस केस की जांच करेगी. फिर से देश में एक बार रेप के खिलाफ गुस्से का माहौल है. 2012 में निर्भया कांड के बाद भी देश में रेप के खिलाफ बड़ा गुस्सा था. बड़ा आंदोलन हुआ और यौन अपराधों के खिलाफ एक नया कानून भी बनाया गया. इसी बीच निर्भया के दोषियों के खिलाफ मामला अदालत में चलता रहा और जिस मामले में एक उदाहरण देने की ज़रूरत थी, उन दोषियों को सजा देने में देश की न्यायपालिका को 8 साल का वक्त लग गया. शायद ये वक्त और भी बढ़ जाता, अगर हैदराबाद में एक और रेप की जघन्य वारदात न होती. उस केस के बाद भी लोगों का गुस्सा फूटा. आंध्र प्रदेश पुलिस ने दबाव में सभी आरोपियों का एनकाउंटर कर दिया. इसके बाद एक बार फिर से लोगों को निर्भया केस की याद आई और फिर उन चार आरोपियों को फांसी की सजा दिलाने का अभियान सा चला. फिर भी कानूनी प्रक्रिया में कमियों का फायदा उठाते हुए दोषियों ने अंतिम समय तक फांसी के फंदे से बचने की कोशिश की.

निर्भया मामला भी देश में रेप का कोई पहला या सबसे जघन्य केस नहीं था. इससे पहले भी रोज रेप की वारदात होती थीं. 1973 के अरुणा शानबाग रेप केस को ही ले लीजिए. 1973 में मुंबई के किंग एडवर्ड अस्पताल में नर्स अरुणा शानबाग का अस्पताल के ही सफाई कर्मी सोहनलाल ने रेप किया था. रेप के साथ उसने अरुणा शानबाग को बुरी तरह मारा भी था. गुनहगार सोहनलाल अदालत से मिली 7 साल की सजा काटकर आजाद हो गया लेकिन अरुणा शानबाग को उस हादसे के बाद अपनी जिंदगी के 42 साल कोमा में बिताने पड़े. अरुणा शानबाग की वजह से ही देश में इच्छामृत्यु पर एक बहस छिड़ी, हालांकि इसकी इजाजत उन्हें नहीं मिली और 2015 में आखिरकार उनका निधन हो गया. एक रेप पीड़िता की जिंदगी पूरी तरह खत्म हो गई, लेकिन उसे इस हाल में पहुंचाने वाला शख्स 7 साल में आजाद होकर घूमने लगा. निर्भया के केस में तमाम गुस्से के बावजूद दोषियों को सजा देने में 8 साल लग गए. इसके अलावा रेप पीड़ितों को लेकर सामाजिक रवैया एक बड़ा सवाल है ही.

इन सबके बीच रेप के झूठे आरोप भी एक बड़ी चिंता का विषय हैं. इस दौर में जब सही मामलों में न्याय नहीं मिल पाता है तो झूठे आरोपों से रेप को देखने की सामाजिक नजर में एक बड़ा बदलाव होता है और हर एक मामले को संदेह की नजर से देखा जाने लगता है. बीते दिनों ट्विटर पर यौन अपराधों को लेकर खासा मुखर रहने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता ने हरियाणा की एक घटना का जिक्र किया. घटना के मुताबिक दो बहनों ने 14 पुलिसकर्मियों पर गैंगरेप का आरोप लगाया था. उनके ट्वीट के बाद कई महिला एंकरों ने भी घटना पर गुस्सा जताया. बाद में ये केस फर्जी निकला और पुलिसकर्मियों से खुन्नस निकालने की कोशिश के रूप में सामने आया. हाथरस के मामले पर भी कई तरह के सवाल हैं. इसी बीच यूपी के बलरामपुर में भी गैंगरेप के मामले पर बड़े सवाल खड़े हुए हैं. अगर 'गांव कनेक्शन' की खबर को मानें तो वहां भी रेप की वारदात पर संदेह है.

ऊपर हमने कई कारणों का जिक्र किया है जिनकी वजह से रेप के मामलों की रफ्तार कम होते नहीं दिखती. खास बात ये है कि ये वो मामले हैं जो पुलिस के पास रिपोर्ट किए जाते हैं. तमाम मामले पुलिस और समाज के सामने आते ही नहीं हैं. अगर हमें रेप की वारदातों को कम करना है, तो एक सामूहिक जिम्मेदारी तय करनी होगी. अगर कोई राजनीतिक दल ये दावा करता है कि सत्ता में आने पर वो रेप की वारदातें कम कर देगा तो तुरंत इसे झूठ मान लीजिए क्योंकि दुनिया की कोई भी सरकार अकेले दम पर रेप को खत्म नहीं कर सकती. ये कोई डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर से खत्म होने वाली समस्या नहीं है. इसके लिए परिवार, समाज और सरकार सभी को एक होना पड़ेगा. पुलिस को अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभानी पड़ेगी, न्यायपालिका को अपना काम करना पड़ेगा और इस सबसे बढ़कर परिवार के तौर पर हम सब को अपने दायित्व निभाने पड़ेंगे. निष्पक्ष कार्रवाई करना, सरकार की ही नहीं हमारी भी जिम्मेदारी है. अगर घर का कोई बेटा अपराध करता है तो उसे कानून से बचाने का ढोंग मत करिए और अपनी किसी पुरानी रंजिश को निकालने के लिए किसी के बेटे के ऊपर रेप का आरोप भी मत लगाइए. फिलहाल ऐसा कुछ होता दिख नहीं रहा है, इसलिए इसकी कोई गारंटी नहीं है कि आगे कोई निर्भया या अरुणा शानबाग का केस नहीं होगा. सावधान रहिए, सुरक्षित रहिए.