हाल ही में वामपंथी नेता सीताराम येचुरी की एक फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुई. इस फोटो में वो तेलंगाना में सिर पर कलश रखे किसी धार्मिक समारोह का हिस्सा बनते नजर आए. आपको बता दें कि वामपंथ ईश्वरवाद में विश्वास नहीं रखता.वामपंथ में धर्म को अफीम की संज्ञा दी गई है.ऐसे में येचुरी की तस्वीर वायरल होने के बाद वो सोशल मीडिया में काफी ट्रोल हुए.पहले इस फोटो को फोटोशॉप भी बताया गया लेकिन बाद में ये तस्वीर सच निकली.येचुरी को ट्रोल करते वक्त केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने लिखा कि 'अच्छे दिन'.

अच्छे दिन से गिरिराज का मतलब था कि ये मोदीराज कि कृपा ही है जो आज एक वामपंथी भी सिर पर कलश रखे धार्मिक समारोह का हिस्सा बन रहा है. एक बार हम गिरिराज की बात को महज ट्रोल और येचुरी के सिर पर कलश रखने को इत्तेफाक भी मान लें तो भी जो आज कि भारतीय राजनीति की दिशा है उसे देखकर वाकई लगता है शायद मोदी राज में अन्य पार्टियों में भी हिंदू बनने की होड़ लग गई है.

गुजरात चुनाव पर निगाह दौड़ाइये तो वहां जब सोमनाथ मंदिर में जाने पर विवाद होता है तो कहा जाता है कि राहुल गांधी तो जनेऊधारी ब्राम्हण हैं.वो राहुल गांधी जिनके अप्रत्यक्ष प्रभाव में एक सांप्रदायिकता विरोधी बिल आने वाला था.सारे जानते हैं कि बिल में तमाम वो पक्षपाती बातें थीं जो हिंदूओं के खिलाफ थीं.विकिलीक्स का वो खुलासा याद कीजिए जब राहुल गांधी अमेरिकी अधिकारी से कहते हैं कि हिंदू आतंकवाद तो लश्कर से भी बड़ा खतरा है.बाटला हाउस एनकाउंटर से लेकर मुंबई अटैक और मांलेगाव विस्फोट तक कांग्रेस ने अपनी राजनीति को एकपक्षीय रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी. जिन दिग्विजय सिंह ने इन तमाम मुद्दों पर विवादित बयान दिए उन्हें खुलेआम राहुल गांधी का राजनीतिक गुरु बताया गया.

2014 में चुनाव हुए और पार्टी हिंदुत्व और विकास का मिश्रण गुजरात से निकले नरेंद्र मोदी के सामने टिक नहीं सकी.पार्टी बुरी तरह हारी. हार के कारण जानने के लिए एक कमेटी गठित की.एके एंटनी इसके प्रमुख थे. कमेटी ने रिपोर्ट दी कि हम एक हिंदूविरोधी पार्टी ज्यादा लग रहे हैं.वैसे कांग्रेस पहले भी सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पकड़ चुकी है. लेकिन आज के दौर में वो कन्फ्यूज हैं.वो हिंदू बनना तो चाहते हैं लेकिन ये जानते हैं कि नरेंद्र मोदी और बीजेपी वाले हिंदुत्व के सामने वो कमजोर पड़ेंगे इसलिए मुसलमानों को भी छोड़ना नहीं चाहते.लेकिन अभी जो रहा है वो हास्यासपद है.

राहुल गांधी कथित मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ एक बैठक करते हैं. उसका पर्याप्त प्रचार प्रसार किया जाता है. बैठक के बाद एक उर्दू अखबार में खबर छपती है कि राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है. यहां तक तो सबकुछ ठीक था लेकिन पीएम मोदी एक सभा में इसका जिक्र करते हैं. उनके जिक्र करते ही कांग्रेस की हालत पतली हो जाती है.पीएम के बयान के जवाब में कई प्रेस कॉफ्रेंस होती हैं.टीवी पर प्रवक्ता लगातार बचाव करते हैं.बीजेपी और हमलावर हो जाती है.राहुल गांधी से जवाब मांगती है और ट्विटर पर वो जवाब देते भी हैं.कुल मिलाकर बीजेपी ने जहां गेंद डाली कांग्रेस ने खेली और बीजेपी ने डॉट बॉल से ही मैच जीत लिया.इससे पहले शशि थरूर के हिंदू पाकिस्तान वाले बयान से खुद को अलग कर कांग्रेस ने अपने डर को दिखाया था.

आज की राजनीति को देखिए.कांग्रेस हिंदुओं से बैर नहीं चाहती.कहां उन्हें हिंदू आतंकवाद से डर लगता था.सीताराम येचुरी कलश रखकर चल रहे हैं.नीतीश कुमार ने तो पाला ही बदल ही लिया है.जब बदला होगा तो ये तो सोचा ही होगा कि बीजेपी के साथ जाने का मतलब है कि मुस्लिम छिटकेगा.इन सबको देखिए तो लगता है कि एक मोदी ने सारी राजनीति को बदलकर रख दिया.बीजेपी पहले भी थी ,बीजेपी आज भी है लेकिन आज वाली दूसरों को बदलाव पर मजबूर कर रही है.

अब जब बात बदलाव की हो ही रही है तो देश के बहुंसख्यकों को ये ध्यान रखना होगा कि कहीं वो वोटबैंक बनकर ही न रह जाएं. एक कथित अल्पसंख्यक समुदाय देश में वोट बैंक माना जाता है.उसकी क्या हालत ये किसी से छुपी नहीं है.कहने को बीजेपी छोड़ सारी पार्टियां इस समुदाय की हितैषी रहीं लेकिन विकास के नाम पर उन्हें कुछ नहीं मिला. इस बदलती राजनीति के दौर में हिंदुओं को भी खुद को वोट बनने से रोकना चाहिए.