अपने भाषण से लेकर राजनीतिक दांवों से विरोधियों को पस्त कर देने वाले पीएम मोदी शायद इन दिनों परेशान हैं.लोकसभा चुनाव से पहले कई चैनलों के ओपिनियन पोल में बीजेपी तो क्या NDA भी बहुमत से दूर है.विरोधी किसी भी हाल में गठबंधन करने को तैयार बैठे हैं.मोदी को हटाने का जुनून कांग्रेस समेत इन सबमें इन दिनों इतना दिख रहा है की चुनाव बाद कर्नाटक की तर्ज पर गठबंधन बन जाए तो कोई बड़ी बात नहीं होगी.सबसे बड़ी बात ये है की विरोधी तो छोड़ पार्टी में नितिन गडकरी जैसे नेता तंज कस रहे हैं.संघ भी सरकार को आंखे दिखा रहा है.कुल मिलाकर एक कठिन चुनाव से पहले तमाम चुनौतियां पीएम मोदी के सामने खड़ी हैं.

हालांकि चुनौतियों और पीएम मोदी की दोस्ती पुरानी है.गुजरात से लेकर दिल्ली तक का सफर उन्होंने बगैर चुनौतियों के पूरा नहीं किया लेकिन इस बार मोदी उतने मजबूत नहीं दिख रहे.हर एक बड़े इवेंट में उत्साहित नजर आने वाले पीएम मोदी की बॉडी लैंग्वेज इन दिनों पहले से कमजोर दिखती है.गणतंत्र दिवस परेड में वो शांति से बैठे दिखे.गुजरात की झांकी आई तब खड़े जरूर हुए.हालांकि जब जनता ने मोदी मोदी के नारे लगाए तो पीएम ने उनके बीच जाकर सभी का अभिवादन किया.पीएम मोदी अभी तक कांग्रेस पर हमलावर रहे हैं.वो कांग्रेस के 70 साल के शासनकाल पर सवाल खड़े करते रहे हैं.जब वो राज्यों में जाते हैं तो वहां विरोधी क्षेत्रीय नेता के खिलाफ भी वैसे ही तेवर दिखाते रहे हैं.विरोधियों पर हमले के साथ वो अपने कामों के बारे में जनता को बताते हैं.लेकिन अभी जो वो कर रहे हैं वो अलग है.वो महागठबंधन पर हमला करते वक्त कहते हैं की अगर ये सत्ता में आ गए तो किस तरह के नुकसान देश को होंगे.

वैसे तो ये चुनाव प्रचार का अपना तरीका हो सकता है लेकिन पीएम मोदी के मामले में ये अजीब लगता है.मोदी के प्रचार का तरीका इस तरह का होता है की पुराने रिकॉर्डों के जरिए विरोधियों पर हमला बोला जाता है लेकिन इस बात का जिक्र कहीं नहीं होता की विपक्षी कभी सत्ता में आएगा भी,हां जनता को इतना बताया ही जाता है की वो अनुमान लगा ले की अगर ये सत्ता में आए तो क्या होगा.ये सुनकर लगता है की शायद इस बार पीएम को भी डर है की विपक्ष भी सत्ता में आ सकता है.कहीं न कहीं वो उस कल्पना की तरफ देख रहे हैं की वो हार भी सकते हैं.बीते दिनों तीन राज्यों में हार के बाद जिस तरह का माहौल बना है शायद ये उसका परिणाम भी है.परिणाम से जिस तरह से किसानों की सरकार के प्रति नारजगी सामने आई वो कहीं न कहीं सरकार को चिंतित करती होगी.जब कांग्रेस लगातार कर्ज माफी की बात कर रही है उस समय में अभी भी सरकार किसानों के बारे में किसी ठोस एलान नहीं कर पा रही है.राफेल डील पर कांग्रेस के सवालों ने कहीं न कहीं लोगों के मन में भ्रष्टाचार को लेकर भी शंकाएं पैदा की हैं.

सवर्ण आरक्षण के लागू होने के बाद भी सरकार ओपिनियन पोल में बहुमत से दूर दिख रही है.कहीं न कहीं हमेशा हार के बावजूद भी मजबूत दिखने वाले पीएम मोदी में इस बार वो आत्मविश्वास नहीं दिख रहा जो हमेशा होता था.1 फरवरी को सरकार बजट पेश करेगी.देखने वाली बात होगी की क्या सरकार कोई ऐसी लोकलुभावन योजना पेश कर पाएगी जिसके जरिए पीएम मोदी अपने स्वाभाविक अंदाज में हमला करके विरोधियों को पस्त कर दोबारा सत्ता की सीढ़िया चढ़ सकेंगे.