यूपी के अलीगढ़ में एक बच्ची से दरिदंगी की वारदात हमारे सामने है. महज तीन साल की बच्ची के साथ आरोपियों ने हैवानियत की सारे हदें पार कर दीं. बच्ची की पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि आरोपियों ने बच्ची का दाहिना हाथ काट दिया, दोनों आंखों में जख्म दिए, पसलियां तोड़ दीं, पैर भी तोड़ दिया, सर में गहरी चोट की, नाक की हड्डी तोड़ दी और इसके बाद बच्ची को कूड़े में फेंक दिया. जहां कुत्ते उसके शव को नोचते मिले. इस सबसे अलग बच्ची के साथ रेप की पुष्टि के लिए स्लाइड भेजी गई है जिसका परीक्षण होना बाकी है. इतना पढ़ने के बाद आपके दिमाग में एक बात तो साफ हो गई कि शायद ही कोई यातना रही हो जिससे उस बच्ची को गुजरना न पड़ा हो.

बच्ची के साथ हैवानियत के दोनों आरोपी एक खास समुदाय से हैं. हालांकि पुलिस ने हेट क्राइम से इंकार किया है. पुलिस के मुताबिक लेनदेन के विवाद में बच्ची के पिता से बदला लेने के लिए इस वारदात को अंजाम दिया गया. बीते समय में देश में लगातार रेप की घटनाएं सामने आई हैं. इनमें भी बच्चियों के साथ रेप के जघन्य अपराध की खबरें सामने आती हैं. ये खबरें रोज आती है. ये हमारा और देश का दुर्भाग्य है यहां चर्चा सिर्फ कठुआ और अलीगढ़ पर हो पाती है क्योंकि इनमें एक खास एंगल निकलकर सामने आता है. फिर भी इन घटनाओं के बाद ही रेप और बच्चियों से हिंसा के मामलों पर लोगों का गुस्सा दिखाई पड़ता है. हालांकि वो कुछ समय के बाद अगली ऐसी ही घटना सामने आने तक के लिए शांत हो जाता है.

हमारे देश में जहां हैवान बच्चियों को भी नहीं बख्श रहे वहां एक सख्त और तेज कानूनी प्रक्रिया होनी चाहिए. आरोपियों पर केस चलाकर जल्द से जल्द सजा का प्रावधान होना चाहिए लेकिन यहां के हालात अलग हैं. एक बच्ची से ही रेप के मामले में 2004 में धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई थी. इसके बाद से रेप के किसी भी दोषी को फांसी नहीं दी गई. 2012 में दिल्ली की सड़कों पर निर्भया रेप जैसे जघन्य कांड के बाद गुस्सा फूटा. लोगों ने प्रदर्शन किया. लगा कि महिला अपराध के खिलाफ कुछ ठोस होने वाला है लेकिन कुछ नहीं हुआ. रेप कांड का एक आरोपी नाबालिग होने का फायदा उठाकर जेल से रिहा हो चुका है. एक ने तिहाड़ जेल में कथित तौर पर फांसी लगा ली लेकिन बाकी आरोपी आज भी जेल में बैठे हैं. इन सभी को सुप्रीम कोर्ट भी फांसी की सजा सुना चुका है लेकिन अभी तक सभी दोषी जेल में बैठे हैं. इन लोगों का आज जिंदा होना ही दरअसल हमारी कानून व्यवस्था और रेप जैसे अपराधों के खिलाफ लड़ने के दावों का मजाक है. जब हमें इन लोगों को जल्द से जल्द फांसी देकर एक उदाहरण सेट करना था तब हम अपनी जर्जर और पुरानी कानून व्यवस्था लिए बैठे हैं.

तमाम बुद्धिजीवी मृत्युदंड का विरोध करते हैं लेकिन देश के जो हालात हैं उसमें रेप के दोषियों को जल्द से जल्द फांसी की सजा मिलनी चाहिए. अगर पीड़ित नाबालिग हो तो दोषियों को दंड मिलने की प्रक्रिया और भी तेज होनी चाहिए. फांसी की सजा इतनी तेजी से मिले कि ऐसा कांड करने से पहले दोषी 10 बार सोचे कि उसका भी हश्र ऐसा ही हो सकता है.