कल बीएसपी प्रमुख मायावती ने दिल्ली में पार्टी एक बड़ी बैठक बुलाई. बैठक में उन्होंने लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के लिए एसपी को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि अखिलेश अपने कोर वोटर यादवों का वोट ही गठबंधन को ट्रांसफर नहीं कर पाए. यही वजह रही की उनके परिवार के सदस्य भी चुनाव हार गए. इसी के साथ मायावती ने यूपी में 10 साल बाद पहली बार उपचुनाव लड़ने का एलान किया. अब बीएसपी यूपी की 11 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव को लड़ेगी. एसपी के लिए ये जोरदार झटका है. अखिलेश यादव के लिए तो झटका है ही और साथ ही राजनीति के एक बड़े प्रयोग के लिए भी झटका है.

यूपी में औपचारिक तौर पर तो अभी गठबंधन टूटने का एलान नहीं हुआ है लेकिन मायावती की धमक दिखाती है कि अब वो महागठबंधन से बाहर आना चाहती हैं. मायावती ने जिस तरह से उपचुनाव लड़ने का एलान किया है उसमें अखिलेश के सामने दो ही विकल्प बचते हैं. या तो मायावती की डांट सुनकर गलती मान लें और गठंबधन का पालन करते हुए सभी सीटों पर मायावती के उम्मीदवारों का समर्थन करें. दूसरा मायावती के इस एलान के बाद गठबंधन तोड़ने की औपचारिक घोषणा अखिलेश करें और सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दें. जिन 11 सीटों पर उपचुनाव होना है वो यें है- रामपुर सदर, जलालपुर, बलहा (सुरक्षित), जैदपुर (सुरक्षित), मानिकपुर, गंगोह, प्रतापगढ़, गोविंद नगर, लखनऊ कैंट, टुडला (सुरक्षित), इगलास, हमीरपुर.

इन सीटों में अधिकतर पर बीजेपी का कब्जा था लेकिन रामपुर सदर की सीट हाईप्रोफाइल और सपा की खास सीट है. ये सीट आजम खान के सांसद बनने के बाद खाली हुई है. अगर अखिलेश मायावती की बात मानते हैं तो उन्हें यहां भी समझौता करना पड़ेगा. आजम शायद ही चाहें कि गठबंधन के चक्कर में उनकी सुरक्षित सीट बीएसपी के पास चली जाए. मायावती की बात इस तरह से मानने से एसपी के कार्यकर्ताओं में एक गलत संदेश भी जा सकता है. इससे साफ संदेश जाएगा कि अखिलेश ने अब मायावती के सामने पूरी तरह से समर्पण कर दिया. अखिलेश का ये कदम पार्टी में उनकी पकड़ ढीली कर देगा हालांकि वो अब अपनी पार्टी के सर्वेसर्वा हैं लेकिन उनका वोटर बिल्कुल दूर जा सकता है.

अब अखिलेश के दूसरे विकल्प पर आते हैं. वो मायावती से गठबंधन तोड़ने का एलान कर दें. ऐसा करने में ये साफ संदेश जाएगा कि अखिलेश ने मान लिया कि बीएसपी से गठबंधन एक गलती थी. सीएसडीएस का सर्वे बताता है कि इस बार चुनाव में यादवों ने भी बीजेपी को वोट किया. गठबंधन तोड़ने से संभव है कि अखिलेश का वोटर उनके साथ वापस आ सके. अखिलेश को इसका फायदा भी हो सकता है लेकिन इस जब एसपी अभी इस हाल में है तो उसके भविष्य के बारे में टिप्पणी करना कोई जल्दबाजी ही होगा.

इस सबके बीच एक अहम सवाल उठता है कि इस गठबंधन के टूटने का बीजेपी और मोदी पर क्या असर है. ऐसा लगता है कि गठबंधन का टूटना मोदी और बीजेपी को एक और मनोवैज्ञानिक जीत दिलाएगा. महागठबंधन यूपी की राजनीति का महाप्रयोग था जिसकी सफलता की उम्मीद बहुत ज्यादा थी. चुनाव में करारी हार से तो इस महाप्रयोग को झटका लगा ही था लेकिन इसके टूटने से ये साफ हो जाएगा कि मोदी के खिलाफ विपक्ष का अस्त्र बेकार चला गया. बहुत से लोगों को उम्मीद थी कि शायद से गठबंधन 2022 के विधानसभा चुनाव तक चल सके लेकिन इसके टूटने से बीजेपी 2019 के चुनाव में एक और बड़ी जीत हासिल करने वाली है. एसपी, बीएसपी समेत समूचे विपक्ष के सामने अब एक बड़ा सवाल फिर से खड़ा हो जाएगा कि आखिर मोदी से पार पाएं तो कैसे ?