लोकसभा चुनाव के समर में हर पार्टी अपना जोर लगा रही है.बीजेपी जहां सत्ता में वापसी के लिए कोशिश कर रही है वहीं विपक्षी दल भी अपना जोर लगा रहे हैं.यूपी नें एसपी-बीएसपी का गठबंधन बीजेपी को हराने के लिए पूरा गणित लगा रहा है.प्रत्याशियों के चयन में गठबंधन बेहद सावधानी बरत रहा है.कल बीएसपी ने अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की है.इसी सूची में मिश्रिख लोकसभा सीट के लिए उम्मीदवार का एलान भी हुआ है. लोकसभा चुनाव के लिए विशेष अंक में आज हम आपको बताने वाले हैं इसी मिश्रिख सीट के गणित के बारे में.अभी यहां सांसद बीजेपी की अंजूबाला हैं लेकिन अब उनका टिकट कट चुका है.बीजेपी के उम्मीदवार अशोक रावत हैं.

मिश्रिख लोकसभा सीट के इतिहास पर एक नजर डालते हैं.मिश्रिख लोकसभा सीट पर 2014 तक 14 बार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें से 7 बार कांग्रेस, 3 बार बसपा और 2 बार बीजेपी ने जीत हासिल की है.सपा ने इस सीट पर एक बार जीत हासिल की है.अशोक रावत 2004 और 2009 में बीएसपी के उम्मीदवार के तौर पर सांसद बने थे.2014 में बीजेपी से अंजूबाला ने यहां जीत हासिल की थी.अंजूबाला ने 2014 के चुनाव में अशोक रावत को 87 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था.यहां कुल 57 फीसदी मतदान हुआ था और अंजूबाला को 4,12,575 वोट मिले थे.
बदलते राजनीतिक समीकरण में इस बार अशोक रावत पर बीजेपी ने भरोसा दिखाया है.

मिश्रिख लोकसभा सीट के तहत पांच विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें बालामऊ, संडीला, बिल्हौर, मिश्रिख और मल्लावां विधानसभा सीटें शामिल हैं. इनमें मिश्रिख सीट सीतापुर जिले से आती हैं जबकि बिल्हौर कानपुर और बाकी तीन सीटें हरदोई में हैं.2017 में राज्य में हुए विधानसभा के मुताबिक इस लोकसभा सीट पर कुल 17,61,853 मतदाता और 1,940 मतदान केंद्र हैं. इस सीट पर अनूसूचित जाति की आबादी बहुलता में है.अनुसूचित जाति की आबादी इस सीट पर 32.98 फीसदी हैं और अनुसूचित जनजाति की आबादी महज 0.01 फीसदी है.

चुनाव में जातिगत फैक्टर बहुत बड़ा रोल तय करने वाला है.बीएसपी ने इस सीट पर नीलू सत्यार्थी को उम्मीदवार बनाया है.शिवपाल यादव की पार्टी प्रसपा ने यहां अरूणा कोरी को उम्मीदवार बनाया है.कांग्रेस ने अभी तक अपना उम्मीदवार तय नहीं किया है.नीलू सत्यार्थी बीते विधानसभा चुनाव में बालामऊ से बीएसपी की उम्मीदवार थीं.बीजेपी के रामपाल वर्मा से वो 23 हजार वोटों से चुनाव हारी थीं.उनके बारे में खास बात ये है की उस विधानसभा क्षेत्र में उन्हें कोई खास जानता भी नहीं था.बीएसपी के परंपरागत वोट के सहारे वो करीब 52 हजार वोट पाने में रहीं.हालांकि विधानसभा चुनाव के बाद से उन्होंने काफी सक्रियता दिखाई है.संसदीय क्षेत्र के उन लोगों को जोड़ने की कोशिश की है जिनके जरिए वोट मिल सकता है.क्षेत्र की मुस्लिम आबादी भी बीजेपी के खिलाफ उनके समर्थन में आ सकती है.बीते चुनाव में बीएसपी प्रत्याशी अशोक रावत को इसका फायदा मिला था.

अरुणा कोरी के बारे में अगर बात की जाए तो बिल्हौर से विधायक रही हैं.अखिलेश सरकार में वो मंत्री भी रही हैं.बीते समय में पारिवारिक संघर्ष में उन्होंने एसपी छोड़ दी और शिवपाल यादव की पार्टी में शामिल हो गईं.कांग्रेस ने अभी तक कोई उम्मीदवार नहीं उतारा है.

इस संसदीय क्षेत्र में पिछड़े वर्ग के कुर्मी वोटर बड़ी संख्या में हैं.बीते चुनाव में अंजू बाला को उम्मीदवार बनाने के पीछे बीजेपी की यही सियासी चाल थी.दरअसल अंजू बाला के पति सतीश वर्मा कुर्मी जाति से हैं और दो बार विधायक रह चुके हैं.ऐसे में उन्हें बीजेपी के कोर वोटर और मोदी लहर के साथ कुर्मी वोटरों का बड़ा साथ मिला था.हालांकि सांसद बनने के बाद अंजू बाला क्षेत्र में बहुत कम गईं.ऐसे में लोग उनसे खुश नहीं थे और बीजेपी ने उनका टिकट काट दिया.अशोक रावत दो बार के पूर्व सांसद हैं.पिछले चुनाव के रनरअप हैं.बालामऊ के बीजेपी विधायक रामपाल वर्मा उनके चाचा हैं.ऐसे में यहां से चाचा पर भतीजे को जिताने की जिम्मेदारी होगी.मल्लांवा-बिलग्राम विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी के विधायक आशीष सिंह आशू पर भी बड़ा दारोमदार होगा.अंजू बाला का टिकट कटने से नाराज कुर्मी समाज को बीजेपी के पक्ष में लाना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी.आशू खुद भी कुर्मी जाति से हैं.

ये तय है की क्षेत्र का अनूसूचित जाति का वोट बड़ी संख्या में बंटेगा.इसके अलावा यहां मुस्लिम वोट बैंक का साथ बीएसपी-एसपी गठबंधन को मिल सकता है.पूरे संसदीय क्षेत्र के आंकड़े हमारे पास नहीं हैं लेकिन मल्लावा-बिलग्राम विधानसभा में 6 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं.बाकी विधानसभाओं के मुस्लिम मतदाताओं वोट अगर एक साथ आते हैं तो बीजेपी के सामने चुनौती होगी.हालांकि इसी विधानसभा में 32 फीसदी दलित वोट हैं.ब्राह्मण और ठाकुर 15 फीसदी हैं. गैर यादव ओबीसी 20 फीसदी हैं जबकि 12 फीसदी वोटर यादव जाति के हैं.बीजेपी की कोशिश होगी की वो अपने कोर वोटर के साथ गैर यादव ओबीसी वोट बैंक को जोड़े.हालांकि बीजेपी यादव वोट बैंक में भी सेंध लगाने का प्रयास करेगी.

मिश्रिख सुरक्षित सीट है.यहां के जातिगत समीकरण से पता लगता है की बीजेपी और बीएसपी के बीच कड़ी टक्कर होने वाली है.हालांकि बीजेपी पीएम मोदी के नाम पर जितना सेंध अपने गैर पारंपरिक वोटबैंक में लगा पाएगी उतना ही फायदे में रहेगी.अगर चुनाव पूरी तरह से जातिगत समीकरणों पर ही आधारित हो गया तो बीजेपी के लिए ये सीट बचाना मुश्किल हो सकता है.