लद्दाख में भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच चला आ रहा गतिरोध पिछले कई हफ्ते से जारी है। जंहा एक ओर दोनों तरफ से कूटनीतिक स्तर पर बातचीत जारी है। वंही साथ ही साथ दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अपने अपने सैनिकों ओर भारी हथियारों का जमावड़ा बढ़ा रहे है।

सीमा पर तनाव के बीच भारत में चीन के राजदूत का कहना है की ड्रैगन ओर हाथी दोनों साथ साथ नाच सकते है ओर सीम पर तनाव का असर दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों पर नहीं पड़ना चाहिए। कुछ लोगों का मानना है की जो हरकत चीन ने लद्दाख में की है वही हरकत अगर पाकिस्तान ने की होती तो भारत बातचीत के बजाय अब तक उस पर टूट पड़ा होता। ये बात सही है की हो सकता है भारत की चेतवानी के बाद भी अगर पाकिस्तानी सैनिक वापस नहीं गए होते तो भारत सैन्य कारवाही करके उन्हें जरूर भगा देता। पर वास्तव में क्या दो अलग अलग देशों खासतौर पर एक देश कंगला हो ओर दूसरा सैन्य ओर आर्थिक दोनों हिसाब से ताकतवार हो, उनके लिए एक जैसे नीति हो सकती है। सीधा सा जवाब है नहीं।

पर चीन की नीति शुरुआत से ही साम्राज्यवादी रही है। तिब्बत पर उसके कब्जे को पूरी दुनिया जानती है। हांगकांग, ताइवान, भारत के सिक्किम, अरुणाचल पर पहले ही वो अपना हक़ जताता रहा है। जब भारत ओर चीन का भूटान के डोकलाम में सैन्य गतिरोध जारी था ओर बाद में वो वंहा से पीछे हट गया क्यों की वंहा पर भारतीय सेनाओं की पोजीशन उससे काफी अच्छी थी। पर इसके बावजूद उसने डोकलाम में इस तरह का गतिरोध क्यों शुरू किया।

असल में चीन के लिए डोकलाम एक तरह का टेस्ट था की भारतीय सेनाओं का क्या जवाब वंहा रहता है। उसने ये भांप लिया की जंहा भारत मजबूत भी है वंहा भी वो सीमा पर उसके अवैध कब्जे को बातचीत से सुलझा रहा है यानी की जंहा पर कमजोर पोजीशन में है वंहा तो लड़ने के बारें में जल्दी सोचेगा ही नहीं। चीन का पुराना इतिहास रहा है वो जितनी बार बातचीत के लिए तैयार होता है उतनी बार अपनी सीमा बढ़ा के बताता है। जाहिर सी बात है वो ये मुद्दे अपनी शर्तो के हिसाब से सुलझाना चाहता है।

सवाल ये उठता है की भारत के पास क्या विकल्प है

चीन की एक बड़ी कमजोरी है। वो ये है की उसकी सीमा जितने भी देशों से लगती है ज्यादातर से उसके सीमा का विवाद है। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है ये एक पुरानी कहावत है ओर भारत ने इस पर अमल करना भी शुरू किया है पर रफ़्तार बहुत सुस्त है। जैसे वियतनाम को ब्रम्होस मिसाइल का बेचना। भारत को चाहिए वियतनाम, इंडोनेशिया जैसे देशों को मिसाइल ओर तेजस जैसे लड़ाकू विमान सस्ते रेट पर बेचें। उनके सैन्य बलों को जरूरी प्रशिक्षण देना ओर साथ ही व्यापारिक रिश्ते भी मजबूत करे।

अभी हाल ही में चीफ ऑफ़ डिफेन्स स्टाफ जनरल रावत ने कहा था की भारतीय फ़ौज ऐसे फ़ौज नहीं है जिसे दूसरे जगह पर जा कर लड़ाई लड़नी है इसलिए गैर जरूरी हथियारों का निर्यात बंद कर देश में बने हथियार का प्रयोग बढ़ाना चाहिए। घर में अच्छे हथियार बनाना ओर रक्षा उत्पाद में महारत हासिल करना एक बात है ओर देश को करना भी चाहिए। पर मौजूदा माहौल में पाकिस्तान के हिसाब से ये बात सही हो सकती है पर चीन के हिसाब से ये बात सही नहीं बैठती।

चीन को काउंटर करने के लिए आपको थल सेना के साथ साथ वायु सेना ओर नौसेना पर बहुत ज्यादा धयान देने की जरूरत है। कश्मीर में जो लड़ाई भारत लड़ रहा है अब समय आ चुका है की ये लड़ाई तकनीकी के जरिये लड़ी जाए। न की लाखों की फ़ौज को पाकिस्तान की वजह से एक सीमा पर ही फोकस कर दिया जाए। सीमा पर चौकसी का काम बड़ी संख्या में ड्रोन ओर जासूसी उपग्रह के जरिये किया जाए साथ ही कश्मीर में होने वाली मुठभेड़ को भी ड्रोन से टार्गेटेड हमले करके निपटाया जाए।

नौसेना ओर वायुसेना के अड्डे भारत से बाहर अन्य देशों के साथ सहयोग कर बनाये जाने चाहिए। भारत ओर ऑस्ट्रेलिया के बीच इस दिशा में बातचीत चल रही है जिसमे ऑस्ट्रेलिया की फौजें भारत के अण्डमान ओर निकोबार द्वीप पर अपने अड्डे बनायेंगी ओर भारत ऑस्ट्रेलिया के कोकोस द्वीप पर अपना नौसैनिक अड्डा बनाएगा। कोकोस द्वीप इंडोनेशिया के पास है और जिस तरह से चीन हिन्द महासागर में अपने कदम बढ़ा रहा है उन्हें रोकने में काफी महत्वपूर्ण है।

अगर भारतीय नौसेना हिन्द महासागर में अपनी मजबूत पोजीशन बना कर नहीं रख पाती है और जिस तरह से चीन लगातार समुद्र में अपनी ताकत बढ़ाता चला जा रहा है तो भविष्य में ये कल्पना करना गलत नहीं होगा की समुद्र से होकर जाने वाले जहाज चीन को समुद्री टैक्स अदा कर रहे हो।