पीएम नरेंद्र मोदी आज एम्स और सफदरजंग हॉस्पिटल में कई सुविधाओं की शुरुआत करने वाले हैं.एम्स में वो देश के पहले नेशनल एजिंग सेंटर की नींव रखेंगे जहां बुजुर्गो के लिए करीब 200 बेड की सुविधा होगी.साथ ही एक धर्मशाला की आधारशिला भी रखी जाएगी जिससे भविष्य में बाहर से आने वाले गरीब मरीजों को अस्पताल में रुकने की सुविधा मिलेगी.
एम्स में अक्सर ही ऐसे नई नई परियोजनाओं की शुरुआत होती रहती है लेकिन फिर भी दिल्ली एम्स की हालत प्रेशर कुकर जैसी है. किसी भी सरकार की योजनाओं का असली फायदा तभी है जब आम जनता उस योजना के फायदे को महसूस कर सके.अगर लोगों की दिक्कतें समान रहती हैं तो इसका कोई फायदा नहीं है.

अगर आपको एम्स में पहली बार दिखाना है तो ऑनलाइन रेजिस्ट्रेशन की सुविधा आपको नहीं मिलेगी.आपको वहां जाना पड़ेगा लाइन में लगना पड़ेगा और पूरा कागजी रेजिस्ट्रेशन जब आप करवाएंगे तब जाकर कहीं आप डॉक्टर तक पहुंचने के काबिल हो सकेंगे.ऊपर की लाइन में जो प्रक्रिया लिखी गई है दरअसल वो बेहद ही आसान तरीके से लिख दी गई है.दरअसल यहां डॉक्टर को दिखाना किसी जंग को जीतने जैसा है.

बीते दिनों पिता जी को एम्स जाना हुआ, यहां के हीमैटोलॉजी विभाग में दिखाना था. इसमें खून संबधित बीमारियों का इलाज किया जाता है.हमें लगा कि अगर सुबह जल्दी पहुंच जाएंगे तो शाम तक तो नंबर आ ही जाएगा. हम घर से जल्दी निकले,एम्स जल्दी पहुंच भी गए.वहां पहुंचकर हमने देखा कि वहां सारे विभागों में रेजिस्ट्रेशन के लिए एक ही लाइन लगी है.लाइन में करीब 400 लोग खड़े हैं. ये लाइन भी कई लाइनों में बंटी हुई है ऐसी की आपको भ्रम हो जाए कि शायद सभी लाइनें अलग अलग हैं.

पहली बार में तो देख के ही हिम्मत कमजोर पड़ गई कि पता नहीं इस तरह तो शायद ही कभी यहां के डॉक्टर देवता के यहां पहुंचना हो.फिर वहां के एक सहायक स्टॉफ से इस बारे में बात की. उन्होंने बताया कि अगर आपको दिखाना है तो रात में करीब 3 बजे आइए यहां पर लाइन में लगिए तो नंबर आ सकता है अन्यथा कोई उम्मीद नहीं है. यहां आपको ये भी बताना जरूरी है कि हफ्ते में 3 दिन ही हीमैटोलॉजी विभाग में आप दिखा सकते हैं और एक दिन में 25-30 मरीजों से ज्यादा देखें नहीं जा जाते. ऐसे में डॉक्टर तक पहुंचना कितना दुष्कर कार्य है ये आप समझ सकते हैं.

3 बजे के बताए वक्त के बावजूद पिता जी वहां 2 बजे ही पहुंच गए. इस सोच के साथ कि शायद वो लाइन में 2-3 तीसरे नंबर के आदमी होंगे लेकिन यहां माजरा कुछ और ही था.यहां करीब 75 लोग उनसे पहले ही लाइन में लगे हुए थे. कोई रात 12 बजे आखिरी मेट्रो से वहां पहुंचकर लाइन में लगा था तो कोई उससे पहले ही.फिऱ भी मन में
विश्वास की तर्ज पर वो वहां डटे रहे. उम्मीद थी की सुबह 7.30 बजे तक से रेजिस्ट्रेशन का काम शुरु होता होगा लेकिन आखिर मामला सरकारी अस्पताल का था तो क्यों न सब अपनी मर्जी के मालिक हों.सुबह 9.30 बजे जाकर के रेजिस्ट्रेशन का काम शुरु हुआ.तब जाकर कहीं डॉक्टर साहब को देख पाने की उम्मीद जगी.

यहां लाइन कथा तो खत्म हुई. इस लाइन कथा की जो कहानी है उसके पीछे कारण कहीं न कहीं देश की भारी जनसंख्या और राज्यों में मेडिकल सुविधाओं का अभाव होना है.एक रिपोर्ट के मुताबिक एम्स में 25 फीसदी मरीज यूपी से आते हैं. हमारे पास आंकड़ा नहीं है लेकिन कमोबेश यही हालत बिहार की भी होगी.दरअसल इतने बड़े देश को दिल्ली एम्स जैसे संस्थान की हर राज्य को जरूरत है लेकिन यहां जो संस्थान हैं उन्हीं की हालत बेहद खराब है ऐसे में हर किसी की क्षमता तो नहीं की वो वो फोर्टिस जैसे मंहगे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करवाए और फिर एस्म के डॉक्टरों का भी स्तर अलग माना जाता है.

एम्स में पहली बार दिखाने के लिए ऑफलाइन रेजिस्ट्रेशन का जरूरी होना हो सकता है उस आबादी को राहत देने के लिए किया गया हो जो अभी भी इंटरनेट से वंचित है. ऐसे में शायद उन्हें बराबरी का मौका देने के लिए ऐसा किया जाता हो लेकिन अगले अंक में जो हम आपको बताने वाले हैं वो कहानी भारत में आम है. हम आपको बताएंगे की किस तरह एम्स और बाकी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं एक ही जैसी हैं जबकि अगर सरकार चाहे तो कम से कम उनमें तो सुधार कर ही सकती है.

ये थी डॉक्टर तक पहुंचने की कहानी अब उसके आगे एम्स का क्या हाल है वो अगले अंक में.........

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