बीते दिनों में निष्पक्ष पत्रकारिता और सत्ता के विरोध की पत्रकारिता का दावा करने वाले कई मीडिया हाउस खुले. इनमें से अधिकतर न्यूज वेबसाइट हैं. कुछ यूट्यूब चैनल भी हैं. कुल मिलाकर इनमें से एक भी अखबार या टीवी चैनल नहीं हैं. इसकी एक बड़ी वजह है कि अखबार या न्यूज चैनल को चलाने के लिए बड़े बजट की ज़रूरत होती है. यह बजट आपको तब ही मिल सकता है जब आप किसी कॉर्पोरेट हाउस से जुड़ें. कॉर्पोरेट के फंड देने की अपनी शर्तें होती हैं. कई बार किसी चैनल या अखबार के जरिए मुनाफा कमाना या उसकी आड़ में अपने बाकी व्यवसायिक हितों को साधना. पत्रकारिता की पढ़ाई दौरान हमारी एक टीचर ने हमें बताया था कि न्यूज चैनलों से आम तौर पर सीधे तौर पर मुनाफा नहीं होता. हां उसके सहारे फायदे लिए जाते हैं, क्योंकि मीडिया एक बड़ी ताकत है और लोग उससे डरते हैं.

चूंकि कॉर्पोरेट के फंड देने की अपनी शर्तें हैं इसलिए वो हर किसी को फंड नहीं देते. इसके जरिए उनका कोई न कोई मकसद तो पूरा ही होना चाहिए. आज के दौर में यह बात बड़ी आम है कि मीडिया खासतौर से टीवी मीडिया, कॉर्पोरेट के सामने बिक चुका है. ऐसे में कई वेबसाइटें यह खुला दावा करती हैं कि वो कॉर्पोरेट से चंगुल से मुक्त हैं और पूरी तरह से स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं. हमने सोचा कि आखिर इनके इस दावे की पड़ताल की जाए. कॉर्पोरेट मुक्त पत्रकारिता का दावा करने वाला ऐसा ही एक संस्थान है- द वायर. इसके तीन फाउंडिंग एडिटर हैं. सिद्धार्थ भाटिया, द हिंदू अखबार के पूर्व संपादक- सिद्धार्थ वरदराजन, और एमके वेणु. इसके 'अबाउट अस' सेक्शन में जाकर आप देख सकते हैं, कौन कौन से संगठन इसको चंदा देते हैं.

वेबसाइट के परिचय की शुरुआत में ही आप जान जाते हैं कि यह पूरी तरह से परंपरागत मीडिया संस्थानों से अलग है. इसके परिचय की शुरुआत कुछ इस तरह से होती है, "Instead of the traditional models of family-owned, corporate-funded and controlled or advertising-driven newspapers, websites and TV channels, can we reimagine the media as a joint venture in the public sphere between journalists, readers and a concerned citizenry? . यहां कॉर्पोरेट फंडेड और कंसर्ड सिटेजनरी जैसे शब्दों पर ध्यान देने की ज़रूरत है, जहां से हमें पता चलता है कि कॉर्पोरेट हाउस आखिर कैसे कंसर्ड सिटेजनरी में बदल जाते हैं.

द वायर की वेबसाइट से हमें जानकारी मिलती है कि इसे कई संगठनों और इसके चाहने वाले 'पाठकों' और 'शुभचिंतकों' की तरफ से फंड मिलता है. द वायर के ऐसे ही एक शुभचिंतक रोहन मूर्ति हैं. रोहन मूर्ति इंफोसिस संस्थापक नारायण मूर्ति के बेटे हैं, वो द वायर के साइंस सेक्शन को 2015 में 1 करोड़ रूपये फंड दे चुके हैं. हम सभी जानते हैं कि द वायर ने साइंस से जुड़ी कितनी 'जबरदस्त' रिपोर्टिंग बीते समय में की है, वो भी 'कॉर्पोरेट' की बिल्कुल मदद के बगैर. खैर रोहन मूर्ति से आगे बढ़ते हैं और द वायर को फंड देने वालों की सूची में सबसे बड़े संगठन के बारे में जानने की कोशिश करते हैं.

द वायर की वेबसाइट के मुताबिक इसे IPSMF से 2017 में 3 करोड़ 7 लाख का फंड मिला. IPSMF के NGO की तरह है जिसे भी कई लोग फंड देते हैं. IPSMF की वेबसाइट पर इन फंड देने वालों के नाम बड़े साफ तौर पर दिए गए हैं. ये नाम इस तरह हैं-
Azim Premji Philanthropic Initiatives Pvt Ltd, Cyrus Guzder, Kiran Mazumdar Shaw, Lal Family Foundation, Manipal Education and Medical Group India Pvt Ltd, Piramal Enterprises Ltd, Pirojsha Godrej Foundation, Rohini Nilekani Philanthropies, Rohinton and Anu Aga Family Discretionary No.2 Trust, RDA Holdings Pvt Ltd, Sri Nataraja Trust, Tejaskiran Pharmachem India Pvt Ltd, Viditi Investment Pvt Ltd, Unimed Technologies Ltd, Quality Investment Pvt Ltd.

ये सभी कॉर्पोरेट समूह हैं, बिजनेसमैन-वुमैन या किसी कॉर्पोरेट समूह से जुड़े हुए संगठन हैं. इनमें से कुछ खास नामों के बारे में हम आपको बताते हैं. 'Azim Premji Philanthropic' विप्रो प्रमुख अजीम प्रेमजी का संगठन है. अजीम प्रेमजी का नाम बड़े दानवीरों में लिया जाता है, यहां भी हो सकता है उनका उद्देश्य दान देना ही हो. किरण मजूमदार श़ॉ बायोटेक्नोलॉजी कंपनी बाइकॉन की चेयरपर्सन हैं. वो ट्विटर पर खासी एक्टिव रहती हैं. इस सूची में शामिल Manipal Education and Medical Group India Pvt Ltd के हेड डॉक्टर रंजन पाई हैं. इस ग्रुप में 6 हॉस्पिटल और 16 कॉलेज हैं. मनिपाल यूनिवर्सिटी की ब्रान्च कई अलग-अलग देशों में है. इनमें एंटीगुआ और दुबई जैसे देश शामिल हैं. इस ग्रुप की लीडरशिप में मोहनदास पई का नाम भी शामिल है जो इंफोसिस के संस्थापक सदस्य रहे हैं. मोहनदास पई भी ट्विटर पर खासे सक्रिय रहते हैं और उन्हें मोदी सरकार का समर्थक माना जाता है.

सूची में शामिल Piramal Enterprises Ltd एक और दिलचस्प नाम है. दरअसल यह मुकेश अंबानी के संबंधियों की कंपनी है. रियल स्टेट से लेकर फॉर्मा तक में पैर पसारे इस ग्रुप के चैयरमैन अजय पीरामल के बेटे आनंद पीरामल के साथ मुकेश अंबानी की बेटी ईशा अंबानी की शादी हुई है. देश में कॉर्पोरेट के नाम का पर्याय बन चुके मुकेश अंबानी के संबंधी को शायद द वायर वाले कॉर्पोरेट का हिस्सा न मानते हों. अगला दिलचस्प नाम Rohini Nilekani Philanthropies का है. ये संगठन इंफोसिस के एक और संस्थापक सदस्य नंदन नीलकेणी की पत्नी रोहिणी नीलकेणी का है. नंदन नीलकेणी आधार योजना के जनक हैं. वो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं और एक समय तो उन्हें कांग्रेस की ओर से पीएम पद का उम्मीदवार तक बनाए जाने की चर्चा थी. इसी तरह से सूची में शामिल बाकी नाम भी या तो खुद कॉर्पोरेट समूह हैं या किसी न किसी कॉरपोरेट ग्रुप से जुड़े हैं.

IPSMF के बारे में एक और खास तथ्य है. इसकी वेबसाइट के मुताबिक इसकी शुरूआत 1 जुलाई 2015 को हुई. यानि मोदी सरकार के 2014 में सत्ता में आने के एक साल के बाद. द वायर ने अपनी वेबसाइट पर 2017 तक का डेटा दिया है, उसके बाद की फंड से जु़ड़ी जानकारी मौजूद नहीं है.

Network 18 नाम का चैनल आप लोग देखते होंगे. अंग्रेजी और हिंदी में इस ग्रुप के कई चैनल हैं, जिनमें CNN-NEWS 18, नेटवर्क 18 हिंदी और CNBC आवाज जैसा बिजनेस चैनल शामिल है. इस पूरे ग्रुप के मालिक मुकेश अंबानी हैं. मोदी सरकार के विरोधी इन चैनलों को अंबानी का चैनल कहते हैं. बीते समय में सरकार के सबसे करीबी बिजनेस समूहों में अंबानी-अडानी का नाम आता रहा है. हर सरकार की अपनी नीतियां होती हैं और वो उन्हें अपने लोगों के मुताबिक लागू करती है. जरूरी नहीं की हर किसी कंपनी को हर सरकार में फायदा पहुंचे. ऐसे में हर कोई अपनी लड़ाई लड़ने की कोशिश करता है. IPSMF द वायर ही नहीं और भी कई ऐसे संगठनों को फंड देता है जो सरकारी विरोधी पत्रकारिता की बात कहते हैं.

अंबानी-अडानी के जरिए जिस तरह से कॉर्पोरेट को परिभाषित किया जाता रहा है उसके मुताबिक कॉर्पोरेट बगैर अपने फायदे के कोई काम नहीं करता और दरअसल कॉर्पोरेट की असली सच्चाई यही है. ऐसे में कॉर्पोरेट मुक्त पत्रकारिता का दावा करने वालों से सावधान रहने की जरूरत है. आखिर अंबानी-अडानी का कॉर्पोरेट, किरण मजूमदार शॉ के कॉर्पोरेट से अलग कैसे हो सकता है? कहीं ऐसा तो नहीं की आप, कॉर्पोरेट हाउसों लड़ाई के एक चेहरे को जन सरोकार की पत्रकारिता का हिस्सा मान रहे हों.

(SHASHANK TRIVEDI is contributing in Hindi journalism from last several years. He worked as Journalist with India Tv and ABP News. He is regular contributor at The People Post. Connect with him at Twitter @sshashanktrive1)