तेलंगाना में आज सुबह तीन बजकर तीस मिनट पर डॉक्टर प्रियंका रेड्डी बलात्कार और हत्या केस में अभियुक्त चारों अपराधी एक पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। पुलिस के अनुसार उन्हें अभियुक्तों पर तब गोली चलानी पड़ी जब वो पुलिस की राइफल छीन कर भागने का प्रयास कर रहे थे।

पुलिस के अनुसार घटनास्थल पर सबूत जुटाने के लिए तथा ये समझने के लिए की अपराध किस तरह से किया गया था इन चारों आरोपियों को वंहा लाया गया था। जंहा से ये सभी भागने लगे और बाद में पुलिस की कार्यवाही में मारे गए। हालांकि पुलिस के कहानी लगभग वही पुरानी कहानी है जो आमतौर पर पुलिस एनकाउंटर के बाद बताती है। एनकाउंटर की खबर लोगों के बीच जैसे ही पहुंची, आम लोगों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया। मीडिया में तमाम वीडियो चल रहे है जिसमे कई महिलाएं पुलिस वालों को मिठाई खिलाते और राखी बांधते देखी जा सकती है। कंही पर लोग पुलिस के समर्थन में नारेबाजी कर रहे है तो कंही पुलिस पर फूल बरसाए जा रहे है।

एक आम नागरिक की सोच से अगर देखा जाए तो बहुत ही अच्छा काम हुआ है। साल दर साल इन्साफ के लिए भटकने वाले आम नागरिक को अगर तुरंत इन्साफ मिल जाये तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। निर्भया केस में अभी भी दोषियों को फांसी की सजा नहीं मिल सकी है जबकि पूरे देश में घटना के खिलाफ आंदोलन हुआ था। ऐसे में अगर हफ्ते भर में अपराधियों को सजा मिल जाये तो बात न्याय संगत है और आपराधियों में खौफ का माहौल भी बनेगा।

एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते जिसका ढ़िढोरा हम पूरी दुनिया में पीटते है की हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र है, हमारी न्याय व्यवस्था की मौजूदा परिस्थिति हमें आगे लेकर नही जा रही है। धीमे धीमे हमें वही करने और सुनने में मजा आने लगा जो अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों में होता रहा है। बलात्कार के आरोपियों को बिना अदालती कार्यवाही के पत्थरों से कुचल कर मार देना या सरेआम फांसी देने की मांग भी उठने लगी है। इस केस में ये मान लिया जाये की चारों अपराधी दोषी थे और पुलिस ने इन्हे मार कर तुरंत न्याय दिलाने का काम किया है तो इस बात की क्या गारंटी है की अगली बार किसी केस में पुलिस आम लोगों के दबाव में किसी निर्दोष को गोली मार कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नही हो जाएगी।

जरा सोचिये कल आपके किसी अपने को पुलिस उठा ले जाये और गोली मार कर कह दे की हमने न्याय कर दिया है उस समय आप कंहा जायेंगे, क्या करेंगे क्यों की भीड़ तो पुलिस के साथ जश्न मना रही होगी। इस तरह का न्याय तात्कालिक रूप से सभी के लिए अच्छा है। पुलिस से काम न करने का आरोप हट गया, दुखी परिवार को न्याय मिल गया और राज नेताओं से दबाव भी कम हो गया साथ ही चुनाव में ऐसे एनकाउंटर को भुनाया भी जायेगा।

आप उस पुलिस पर आँख मूँद कर कैसे विश्वास कर सकते है जो अकसर आपराधों की रिपोर्ट ही नही लिखती या कई बार उन अपराधियों के साथ जा कर खड़ी हो जाती है जो पैसे दे सकते है। पुलिस का काम अपराधी को पकड़ने का है और सबूत जुटाने का है न की अदालत का काम करने का।

ऐसी नौबत कैसे आ गयी की पुलिस ही अदालत का काम करने लगी है। उसका का एक ही जवाब है जर्जर न्यायिक व्यवस्था। अगर आपकी अदालतें सही समय पर न्याय नही दे सकती है। व्यवस्था में भ्रष्टाचार का बोलबाला होगा तो इस तरह की घटनाओं में वृद्धि होना आम बात बन जाएगी। लोग धीमे धीमे कर कछुआ की चाल वाले अदालती व्यवस्था से परेशान हो चुके है। अब लोगों का धैर्य जवाब देने लगा है। अगर जल्द ही इस व्यवस्था को सुधारा नही गया तो भारत में भी जल्द ही भीड़ द्वारा सरेआम न्याय किया जाने लगेगा।

इस घटना से दो तरह के लोगों को सबक लेना चाहिए। पहले हमारे राज नेता जिन्हे समझना होगा की लोग अब इस सुस्त, सड़ी हुई न्याय व्यवस्था को ज्यादा समय तक बर्दास्त नही करेंगे। अब समय आ चुका जब अदालती सिस्टम को चुस्त दुरुस्त कर लोगों को समय पर न्याय दिलवाया जाये। अपराधियों के लिए भी अब सबक लेने का समय आ गया है की लोग अब अदालतों के चक्कर लगाने के बजाय भीड़ की शक्ल में खुद भी न्याय करने पर उतर सकते है तो ऐसे में अपराध की दुनिया से दूरी बना ली जाए।