अगर आम धारणाओं को पीछे छोड़ भी दें तो मेरा व्यक्तिगत अनुभव भी इस मायने में बिल्कुल उलट है. जब मैं IIMC में पढ़ाई कर रहा था तो JNU के पुराने कैंपस स्थित CRPF बेस में मेरे एक मित्र रहते थे. वो अक्सर या तो मुझे वहां खाने ले जाते थे या मेरा खाना पैक करा के लाते थे. हर बुधवार और रविवार तो मैं वही खाता था लेकिन इसके अलावा भी सप्ताह में 3-4 दिन का खाना वहीं होता था. ये सिलसिला तकरीबन 6 महीने चला और इन 6 महीनों के दौरान ये समझने को मिला कि आर्म फोर्सेज की डाइट कितनी हेल्दी और उच्च गुणवत्ता वाली होती है.

इससे पहले भी रांची रहने के दौरान अक्सर दीपा टोली कैंट में खाना खा लिया करता था.लेकिन कभी ये नहीं लगा कि तेजबहादुर जिस तरह की दाल दिखा रहे थे, वैसी दाल खाकर आर्म फोर्सेस गुजारा करती होंगी.

देखिये आर्मी BSF या CRPF में दो तरह के मेस होते हैं, एक ऑफिसर्स मेस और एक जनरल मेस लेकिन दोनों ही मेस में परोसे गए खाने की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाता. हां आपको पिज्जा-बर्गर जैसे आइटम तो नहीं मिलेंगे लेकिन एक हेल्दी डाइट के हर पैरामीटर पर खरा उतरने वाली डाइट उपलब्ध कराई जाती है, इसमें कहीं कोई सन्देह नहीं है.

तो फिर तेज बहादुर यादव की शिकायत महज पब्लिसिटी स्टंट है? देखिये इसमें दो बातें हैं, अव्वल तो ये कि तेज प्रताप समय-समय पर अपना बयान बदलते रहे. कभी कहा कि खाना खराब है फिर कहा कि मेस में घोटाला हुआ है, उसके बाद कहा कि उनके पास करोड़ों के घोटाले के सबूत है , फिर कहा कि उन्हें बंधक बनाकर रखा गया है. वो अलग बात है कि बीएसएफ से बर्खास्त होने के बाद कभी उन्होंने करोड़ो के घोटाले के सबूत कभी सामने नहीं रखा.दूसरी बात है फ्रस्ट्रेशन और लाइमलाइट में आने की जल्दबाजी. तेज बहादुर यादव के तत्कालीन गतिविधियों को देखें तो साफ हो जाता है कि पूरा प्लान उनके दिमाग में था बस उसको एक्जिक्यूट नहीं कर पाए. वर्ना उन्होंने खाने की शिकायत करने के साथ ही वीआरएस के लिए आवेदन कर दिया था. बिना जांच पूरी हुए ही वो रिटायर होना चाहते थे और उनकी पत्नी हाय-तौबा मचा रही थीं कि उनसे मिलने नहीं दिया जा रहा. जिसे कि हाई कोर्ट ने भी गलत माना था.

दरअसल उनका पूरा प्लान ही यही था कि वे शिकायत करें और उनके साथी भी उनके साथ बगावत का रास्ता अख्तियार कर लें, जिसके बाद सीनियर अफसरों और सिपाहियों के बीच टकराव जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाये और वो रिटायरमेंट लेकर तमाशा देखें. लेकिन भला हो देश का कि उनके साथी इस बगावत वाली मुहिम के साथ नहीं जुड़े. हां बाद में जो जांच में सामने आया वो चौंकाने वाला था. दरअसल तेज बहादुर के फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में 15 प्रतिशत पाकिस्तानी थे और उनकी टाइमलाइन पाकिस्तानियों के सन्देश से भरी हुई थी.

आज जब तेजबहादुर वाराणसी से नरेंद्र मोदी के सामने चुनाव लड़ रहे हैं तो ना तो उनके खिलाफ हुई जांच और उस में निकल कर आये तथ्य के बारे में ही सवाल पूछा जा रहा है, ना ही अपनी महत्वाकांक्षा के चक्कर में आर्म फोर्सेज के अंदर बगावत कराने की उनकी मंशा पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. बस तेजबहादुर को नेता बना दिया गया है और उनमें महापुरुष की छवि प्लांट कराई जा रही है. यही विडंबना है. यही दुर्भाग्यपूर्ण है

(ये लेख विवेक सिंह के फेसबुक पेज से लिया गया है, विवेक ZEE Media Corporation में पत्रकार है।)