बीते कुछ सालों में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय काफी चर्चा में रहे हैं. चर्चा में कहना शायद काफी नहीं होगा बल्कि नकारात्मक चर्चा में रहे हैं, शायद यह पूर्ण हों. हालांकि, यह निर्णय पक्षानुसार पसंद किए जाते रहे हैं, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को ऐतिहासिक या बकवास अपने अपने पक्ष के मुताबिक बताया जाता है. जब तक सुप्रीम कोर्ट के फैसले केंद्र सरकार के खिलाफ आते रहे, एक विचारधारा के लोग उन्हें ऐतिहासिक बताते रहे. उत्तराखंड में सरकार गठन के मुद्दे पर फैसला हो या NJAC पर केंद्र सरकार को झटका, यहां तक कि रंजन गोगोई समेत 4 जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस तक को ऐतिहासिक बताया गया. लेकिन आगे की कहानी में लगभग सभी फैसले केंद्र सरकार के समर्थन में थे. ऐसे में न्यायपालिका को सरकार की गोद में बैठा हुआ बताया जाने लगा.

किसी मुद्दे पर असहमत होना अलग बात है. सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा पर सवाल उठाना भी किसी एक मत हो सकता है. लेकिन बीते हफ्ते जो हुआ, वो न्यायपालिका के साथ, मीडिया और समाज के लिए अपने-आप में शर्मिंदगी भरा है. अभी तक फेक न्यूज के दायरे से सुप्रीम कोर्ट बचा हुआ था लेकिन उसे भी बड़े संगठित तरीके से इसमें लपेट लिया गया. दरअसल पूरा मामला रेप से जुड़े एक मामले की सुनवाई का था.

सुप्रीम कोर्ट कवर करने वाली वेबसाइट लाइव लॉ ने इस मामले को पूरा विस्तार से लिखा है, "लड़की ने आरोप लगाया कि 2014-2015 के दौरान, जब वह लगभग 16 साल की थी और नौवीं कक्षा में पढ़ रही थी, तब आरोपी उसे घूरता था. चूंकि वह उसका दूर का रिश्तेदार था, इसलिए वह उसके घर आती रहती थी. आगे आरोप में कहा कि उस अवधि के दौरान, वह (अभियुक्त) पीछे के दरवाजे से उसके घर में घुस आया उसके साथ बलात्कार किया. इसके साथ ही अभियुक्त की ओर से उस लड़की को किसी से कुछ भी न बताने की धमकी दी. आरोप में कहा गया है कि उसके बाद भी उसने लगातार उसे डराया और धमकाया. आगे कहा कि वह अक्सर उसके घर आता और यौन संबंध बनाता था. उसने यह भी कहा है कि कभी-कभी, वह गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करती थी. चूंकि वह डरती थी, इसलिए उसने कभी भी इस बात का खुलासा नहीं किया.

आरोप में आगे कहा गया है कि जब उसने एक सामाजिक कार्यकर्ता की मदद से पुलिस शिकायत दर्ज करने की कोशिश की, तो आरोपी की मां ने उसे शिकायत दर्ज कराने से यह कहते हुए मना कर दिया कि वह उसे एक बहू के रूप में स्वीकार करेगी. उसने आगे आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने एक बार अपनी अनपढ़ मां से एक स्टांप पेपर पर एक लेखन को निष्पादित करवाया, जिसमें कहा गया कि दोनों के बीच संबंध था और उसकी (पीड़ित) सहमति के साथ, वे दोनों सेक्स में लिप्त थे. यह वादा किया गया था कि वह लड़की के बालिग होने के बाद उससे शादी करेगा. हालांकि, आरोपी अपने वादे से पीछे हट गया और उसने किसी और से शादी कर ली."

चूंकि मामला शादी से मुकरने का था, इसलिए चीफ जस्टिस एस ए बोबडे ने आरोपी से सवाल पूछा कि क्या वो पीड़िता से शादी के लिए तैयार है? इस एक सवाल को लेकर एक बड़ा एक पक्षीय सवाल खड़ा किया गया. कहा गया कि चीफ जस्टिस ने रेप के एक मामले में शादी करवाकर समझौते कराने की कोशिश की, जो कि किसी भी रेप पीड़िता की गरिमा के खिलाफ है. वाकई ऐसा होता तो वह गलत भी था लेकिन चूंकि यहां पीड़िता खुद शादी के लिए तैयार थी और मुख्य मामला ही शादी से मुकरने का था, ऐसे में चीफ जस्टिस ने आरोपी से यह सवाल पूछा.

इस पूरे मामले पर यह रवैया देखकर CJI को कहना पड़ा कि इस पूरे मामले की गलत रिपोर्टिंग हुई. चीफ जस्टिस ने आगे कहा, "एक संस्था और न्यायालय के रूप में हम हमेशा से नारीत्व के प्रति सर्वोच्च सम्मान रखते हैं".

दिक्कत इस बात की है कि आखिर क्यों लोग किसी मामले पर अंधाधुंध टिप्पणी करने से पहले पूरा मामला पढ़ना क्यों नहीं पसंद करते हैं. आप ट्विटर पर लिखते हैं, फेसबुक पर लिखते हैं. देश-विदेश के तमाम लोग इसे पढ़ते होंगे. आखिर वो यह सब पढ़कर भारत के बारे में क्या राय बनाते होंगे. बेवजह किसी मामले को तोड़-मरोड़कर इस तरीके से सुप्रीम कोर्ट के बारे में लिखना बिल्कुल भी सही नहीं है. संवैधानिक व्यवस्थाओं पर लोगों का भरोसा पहले ही कमजोर हो चुका है और अगर यही हालत रही तो आगे की स्थिति और भी बुरी हो जाएगी. लोकतंत्र में भरोसा ही सब कुछ है और वही खत्म हो गया तो क्या होगा, इसकी कल्पना करनी हो तो पाकिस्तान या किसी भी तानाशाही शासन वाले देश का इतिहास उठाकर पढ़ लें.