600 फ़ीट गहरे बोरवेल में 80 फ़ीट की गहराई में फँस कर मौत का शिकार हुआ 2 साल का सुजीत विल्सन अपनी मौत के बाद पीछे कई सवाल छोड़ गया है। सवाल सरकारी तंत्र की असफलता के साथ साथ हमारी अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाही के।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है की कोई बच्चा खुले हुए बोरवेल में गिरा हो और 3-4 दिन चले राहत बचाव कार्य के बाद उसकी मौत हो गयी हो। दर्जनों बार हो चुके इस तरह के हादसे के बाद बेहद ही गिने चुने बार सफलता पूर्वक किसी बच्चे को सही सलामत निकाला जा सका गया है। कुछ महीनों पहले ही उत्तर प्रदेश में इसी तरह के हादसे के बाद लड़की की लाश तक नहीं निकाली जा सकी थी और कई दिनों तक चली खुदाई के बाद उसे उसी बोरवेल में दफ़न कर दिया गया। और उसके ऊपर से बना दी गयी उस बच्ची की समाधी।

बोरवेल में गिरने से लेकर और बच्चे की मौत तक एक घटनाचक्र है जो हर बार होता है। बच्चे ज्यादातर उन बोरवेल में गिरते है जो या तो ख़राब हो चुके है या जिनमे बोरिंग करते समय पानी नहीं निकल पाया। दोनों ही केस में बोरवेल को खुला छोड़ के उसे टाट या प्लास्टिक के बोरी से ढक दिया गया होता है। उसके बाद खबर लोकल मीडिया से होते हुए राष्ट्रीय मीडिया में पहुँचती है। फिर लोकल प्रशासन की मदद करने सेना के जवान और NDRF वाले पहुंचते है। 2-3 दिन तक सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनल, अखबार सभी को बढ़िया न्यूज़ मिल जाती है। साथ में वायरल की जाती है बोरवेल में फंसे हुए बच्चे की फोटो, कुछ बोरिंग करने वाली बड़ी मशीन और साथ में लगे हुए सेना के जवान और टीवी न्यूज़ चैनल पर नयी बनायीं जा रही समनांतर सुरंग की तकीनीकी समझाता न्यूज़ एंकर।

फिर धीमे धीमे नेता गण भी अपनी अपनी दुआ देने लगते है और आखिर में दौर आता है "रेस्ट इन पीस" का। उसके बाद फिर इन्तजार शुरू हो जाता है अगली बार किसी और बच्चे के बोरवेल में गिर कर फंसने और उसके जीवित या मृत निकलने का। बोरवेल में गिरने के हादसे इतनी बार हो चुके है की दुआ देने वाले नेता चाहे तो संसद में कानून पास कर सकते है। क्यों की हम हिंदुस्तानी बिना जबरन कानून का पालन कराये अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझते ही नहीं है। जब आप लाखों रुपये बोरवेल खुदवाने से लेकर और मोटर पंप लगवाने में खर्च कर सकते है तो असफल बोरिंग या ख़राब बोरवेल को मजबूती से बंद कर देने में होने वाले चंद रूपये क्यों नहीं खर्च कर सकते। अगर हर व्यक्ति जो भी अपने खेत या निजी जरूरत के लिए बोरिंग करा रहा है और असफल रहने पर बोरवेल को मजबूती से कवर कर दे तो इस तरह की कोई समस्या ही नहीं आएगी।

अब सवाल ये है की अगर लोग अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं कर पा रहे है तो ये सरकार की जिम्मेदारी है की वो ऐसे कानून बनाये की लोग अपनी जिम्मेदारी का पालन करें। सरकार चाहे तो ऐसे कानून बना सकती है की किसी भी तरह के बोरिंग कराने से पहले स्थानीय प्रशासन से मंजूरी अनिवार्य हो और स्थानीय प्रशासन ये पक्का करें की बोरवेल या असफल बोरिंग खुली न हो। बोरवेल खुला पाए जाने पर उसके मालिक पर आर्थिक दंड लगाया जाये और उसके बाद भी अगर उसे दोबारा खुला पाया जाये तो बोरवेल मालिक को जेल भेजने का प्रावधान बनाया जाये। और किसी के बोरवेल में गिरकर अगर किसी बच्चे की मौत हो जाये तो मालिक के खिलाफ हत्या जैसे संगीन धाराओं में मामला दर्ज किया जाये।

आप सोचिये हमारी अपनी लापरवाही की वजह से एक बच्चा जिसे अपनी जिंदगी में काफी कुछ सीखना और अनुभव करना बाकी था वो बिना कुछ देखे एक 6 इंच की चौड़ाई के सैकड़ो फ़ीट गहरे गढ्ढे में दम घुट के मर जाए। मरते वक्त उस बच्चे के दिमाग में क्या चल रहा होगा जो ज़्यदातर खेलना और मस्ती करना चाहते है। कम से कम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए इंसान बने और यह सुनिश्चित करें की आप के आस पास कोई भी बोरवेल खुला न हो।