बीजेपी ने बड़ी उम्मीदों से भोपाल में प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाया था. बीजेपी की रणनीति दिग्विजय के खिलाफ प्रज्ञा को उतारकर हिंदू आतंकवाद के मुद्दे को फिर से बीजेपी जिंदा करना चाहती है. भोपाल बीजेपी की मजबूत सीट है. प्रज्ञा ठाकुर हो सकता है दिग्विजय को हरा भी दें लेकिन बीजेपी के लिए बीते कुछ दिनों से वो मुसीबत बन चुकी हैं. चुनाव के इस मौसम में बीजेपी को प्रज्ञा के बयानों के लिए माफी मांगनी पड़ रही है. पहले हेमंत करकरे पर उन्होंने विवादित टिप्पणी की और अब महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को उन्होंने देशभक्त बता दिया.

प्रज्ञा के बयानों के दो पक्ष हैं. एक राजनीतिक पक्ष है जिसमें प्रज्ञा के बयान की सार्वजनिक तौर पर तो निंदा हो रही है और बीजेपी ने उनके बयान से पल्ला झाड़ लिया है लेकिन देश में एक तबका ऐसा भी है जो मुस्लिमों को भारत में रोकने के लिए महात्मा गांधी को एक अपराधी मानता है. ये दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन सच है. इस सोच को फैलाने के लिए RSS को जिम्मेदार माना जाता है. हालांकि RSS ने कभी भी गांधी जी की आलोचना नहीं की. यहां तक की बीजेपी के नेता भी गांधी जी की आलोचना नहीं करते. 2014 के पहले तक फेक न्यूज के तौर पर फैले वाट्स एप मैसेज पर अगर आप गौर करेंगे तो उनमें गांधी और नेहरू की तमाम बुराईयां की जाती हैं. 2014 में सरकार बनने के बाद पीएम मोदी ने गांधी जी का अपने भाषणों में कई बार जिक्र किया और स्वच्छता अभियान जैसे कार्यक्रम उन्हें समर्पित किए. वक्त के साथ वाट्स एप मैसेज से गांधी हट गए और नेहरू की बुराईयां आज भी जारी हैं.

राजनैतिक तौर पर देखें प्रज्ञा ठाकुर के बयान की भले ही बुद्धिजीवियों और सार्वजनिक समाज में निंदा हो लेकिन तमाम ऐसे लोग होंगे जो उनके बयान से खुश होंगे. हालांकि बीजेपी ने प्रज्ञा के बयान से किनारा किया और उन्हें माफी मांगने को मजबूर किया लेकिन प्रज्ञा कहां रूकेंगी इसका कुछ भी पता नहीं. देश को इस बात की चिंता होनी चाहिए अगर ये महिला सांसद बनकर संसद पहुंचती है तो किस तरह की शर्मिंदगी का सामना भारत को भी करना पड़ सकता है क्योंकि वो तब देश की संसद में बोल रही होंगी. खैर उनका चुनाव जनता पर छोड़ देना चाहिए लेकिन कम से सांसद बनने के बाद वो ऐसा बयान न दें इसकी चिंता बीजेपी और पीएम मोदी को भी करनी चाहिए. पीएम मोदी ने बीते दिनों प्रज्ञा की उम्मीदवारी को सही बताया था.

प्रज्ञा ठाकुर के बयान का एक और पक्ष है जो वो सामाजिक पक्ष है. इस बात में किसी को भी शक नहीं होना चाहिए कि नाथूराम गोडसे एक हत्यारा था. जिसने गांधी से महज वैचारिक असहमति होने पर उनकी हत्या कर दी. उन महात्मा गांधी की जिन्होंने देश की आजादी से लेकर अखंडता तक के लिए अपना जीवन समर्पित किया. जब देश की फिलहाल सत्ताधारी पार्टी जिसके फिर से सत्ता में आने की संभावनाए काफी ज्यादा हैं का कोई उम्मीदवार इस तरह का बयान देता है तो सामाजिक तौर पर एक गलत संदेश जाता है. देश के तमाम जवान होते युवा प्रज्ञा के बयान को किस तरह से देखेंगे. बीजेपी ने भले ही प्रज्ञा के बयान से किनारा किया हो लेकिन अगर वाकई इस वक्त बात कड़ा संदेश देने की कि जाए तो प्रज्ञा ठाकुर को पार्टी से निकालना सबसे कड़ा संदेश हो सकता है. बेशक इस चुनावी सीजन में जब एक दौर का चुनाव बाकी है तो बीजेपी इतना बड़ा फैसला नहीं लेगी लेकिन अगर सामाजिक पक्ष को ध्यान में रखा जाए तो भारतीय समाज के लिए यही सही कदम होगा. बाकी अगर ऐसे ही प्रज्ञा बयान देतीं रहीं तो फिर किसी मैगजीन में पीएम मोदी को फिर से डिवाइडर इन चीफ कह दिया जाए तो उनके समर्थकों को हैरानी नहीं होनी चाहिए.