हाल ही में पीएम मोदी ने अपने प्रचार अभियान के दौरान पूर्व पीएम राजीव गांधी को निशाना बनाया. उन्होंने राहुल गांधी को संबोधित करते हुए कहा कि दरबारियों ने आपके पिता की छवि मिस्टर क्लीन की बना दी थी लेकिन देखते ही देखते भ्रष्टाचारी नंबर 1 के तौर पर उनका जीवन समाप्त हो गया. पीएम मोदी के इस बयान की खासी आलोचना हुई. राहुल गांधी ने इसे लेकर ट्विटर पर ट्वीट के जरिए पीएम मोदी को जवाब दिया. उनके अलावा तमाम पत्रकारों और कथित बुद्धिजीवियों ने भी पीएम मोदी के बयान की निंदा की.

अगर पीएम के बयान की बात की जाए तो उसमें एक साधारण सा सिद्धांत लागू होता है. हमारी संस्कृति में मृत लोगों की आलोचना को उचित नहीं माना जाता. जो व्यक्ति खुद पर लगे आरोपों का जवाब भी नहीं दे सकता उसे इस राजनीति में खींचना और आलोचना करना गलत संकेत देता है. पीएम ने चूंकि राजीव गांधी के जीवनकाल के खत्म होने की बात की तो इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि उनकी मौत कोई साधारण मौत नहीं थी. वो भी चुनाव प्रचार के दौरान लिट्टे की साजिश का शिकार हुए थे इसलिए और भी पीएम का बयान निंदनीय लगता है. शायद भविष्य में पीएम अगर खुद इस बारे में सोचेंगे तो उन्हें ये बुरा लगेगा. दूसरी तरफ एक तर्क यह भी हो सकता है कि पीएम जैसे पद पर रहे लोगों की आलोचना तो की जा सकती है क्योंकि लोगों का वोट उन्हें तय करता है और देश के बारे में उनके फैसलों की आलोचना तो की ही जा सकती है. इस तर्क के आधार पर भी देखें तो पीएम की आलोचना थोड़ी ज्यादा तीखी मालूम पड़ती है. पीएम अक्सर पंडित नेहरु की आलोचना करते हैं लेकिन उनकी ये आलोचना सिर्फ आलोचना भर ही होती है. उसमें इस तरह का तीखापन नहीं होता जिस पर सवाल खड़े किए जा सकें.

अब इस दौरान हुई चर्चाओं पर जाते हैं. एक तरह की होड़ सी लगी. जिसके तहत राजीव गांधी को मिस्टर क्लीन बनाने का अभियान फिर से चल गया. लगातार लेख लिखे गिए और बताया गया कि राजीव गांधी ने कौन कौन से अच्छे काम किए. इन चर्चाओं को देखकर लगा कि दरबारी आज भी दरबार में उतने ही सक्रिय हैं. ये बेहद ही चौंकाने वाला लगता है कि इस दौरान राजीव गांधी के पीएम पद के कार्यकाल की सिर्फ खूबियों की चर्चा हुई. अगर देश के बुद्धिजीवियों का राजीव गांधी की छवि का ये सकारात्मक विश्लेषण एक तरह का जनता में भावुकता पैदा करने का प्रयास नजर आता है. जिसके जरिए गांधी परिवार के लिए एक सहानुभूति का जन्म होगा. पीएम मोदी पर अक्सर इसी तरह का भावुकता पैदा करने का आरोप ये बुद्धिजीवी समाज लगाता है, लेकिन ये विडंबना है कि ये वर्ग अब पार्टियों के बीच में किसी एक पक्ष के लिए खुलकर भावुकता पैदाकर सहानुभूति जुटाने का प्रयास कर रहा है.

अगर बुद्धिजीवी वर्ग पीएम के बयान पर राजीव गांधी के पीएम पद पर कार्यकाल की समीक्षा ही करना चाहता था तो उसे राजीव गांधी की खूबियों और कमियों दोनों के बारे में बात करना चाहिए थी. राजीव गांधी के कंप्य़ूटर क्रांति और भविष्य़ को लेकर विजन तारीफ की जानी चाहिए. वामपंथियों के विरोध के बावजूद उन्होंने ऐसा किया. उन्होंने श्रीलंका में आतंकवाद खत्म करने के लिए सेना भी भेज दी. हो सकता है वो फैसला उन्हें भारी पड़ा हो लेकिन उनका ये कदम एक सख्त प्रशासक के तौर पर था.उनकी विदेश नीति की भी तारीफ की जाती है.इन सबके बीच उनकी कुछ खामियां भी थीं. उनके पीएम रहते भोपाल गैस त्रासदी का जिम्मेदार वारेन एंडरसन देश से भागने में कामयाब रहा. शाहबानो केस में फैसले को पलटना भी एक गलत कदम था जिसने मुस्लिम समाज को फिर से पीछे धकेल दिया. राजीव गांधी ने अयोध्या में जिस तरह विवादित स्थल का ताला खुलवाया और फिर उसके पड़ोस में राम मंदिर के लिए शिलान्यास का आदेश दिया. उनके फैसले ने अयोध्या विवाद को बढ़ावा दिया. आज भी देश इस विवाद की कीमत चुका रहा है. आखिर में उस बोफोर्स की बात भी कर लेते हैं जिसको लेकर पीएम ने निशाना साधा है. बोफोर्स तोप घोटाले में राजीव गांधी खुद ही आरोपी थे.हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी के समय में चार्जशीट से उनका नाम हट गया लेकिन बोफोर्स तोप सौदे का दलाल क्वाचोत्री यहां से भागने में कामयाब रहा. बोफोर्स में घोटाला हुआ ये बात साफ है और वो राजीव गांधी के पीएम रहते ही हुआ था. ऐसे में मनमोहन सिंह की तरह वो भी अपने शासनकाल में किए गए इन गलत फैसलों के लिए आलोचना के शिकार होते रहेंगे.

देश के बुद्धिजीवी समाज को अपनी इस पक्षकारिता से बाज आना चाहिए. नरेंद्र मोदी को आगे बढ़ाने में इसी पक्षकारिता का बढ़ा हाथ है. दूसरी तरफ पीएम मोदी को भी अपने लहजे को देखने की जरूरत है. कई आलोचना करते हुए सीमाओं को लांघ जाते हैं. राजीव गांधी की आलोचना में भी ये बात दिखाई पड़ती है. एक पीएम के तौर पर उनका ऐसा करना शोभा नहीं देता.