दो चरणों के लोकसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं.अगली 23 मई को अगले चरण के चुनाव होंगे.बीते दिनों से हम आपको यूपी की अलग अलग लोकसभा सीटों के समीकरणों के बारे में जानकारी देते रहे हैं.आज हम आपको जानकारी देने वाले हैं यूपी की एक हॉट सीट के बारे में. हम आपको जानकारी देने जा रहे हैं यूपी की प्रतापगढ़ सीट के बारे में. प्रतापगढ़ जिसका नाम सुनते ही आप के दिमाग में राजा भइया का नाम आता है और ये चुनाव तो उनके लिए और भी खास है तो चलिए आपको ले चलते हैं प्रतापगढ़ के समीकरणों के सफर पर.यहां 12 मई को लोकसभा चुनाव होंगे.

प्रतापगढ़ का नाम सुनते ही भले आपके जेहन में राजा भइया आते हों लेकिन प्रतापगढ़ लोकसभा सीट का मिजाज अलग है.यहां अब तक 15 बार लोकसभा चुनाव हुए हैं और इनमें से 9 बार यहां कांग्रेस ने जीत दर्ज की है.एक बार सपा, एक बार बीजेपी और जनता दल,जनसंघ,अपना दल ने भी एक एक बार यहां जीत हासिल की है. इस तरह से ये बात साफ होती है कि प्रतापगढ़ लोकसभा सीट कांग्रेस का गढ़ रही है.

हाल के सालों में बात की जाए तो यहां 1998 में पहली और इकलौती बार बीजेपी ने जीत दर्ज की थी. तब रामविलास वेदांती ने यहां बीजेपी को जीत दिलाई थी. हालांकि एक साल बाद फिर से चुनाव हुए और देश के पूर्व विदेश मंत्री और प्रतापगढ़ के राजा दिनेश प्रताप सिंह की बेटी राजकुमारी रत्ना सिंह ने यहां बीजेपी को शिकस्त दी.राजकुमारी रत्ना सिंह तब भी कांग्रेस में थीं और अभी भी कांग्रेस में ही हैं.

2004 के लोकसभा चुनाव में यहां एंट्री हुई बाहुबली राजा भइया की. राजा भइया ने सपा के टिकट पर अपने चचेरे भाई अक्षय प्रताप सिंह ऊर्फ गोपालजी को यहां से उतारा. क्षेत्र में राजा भइया का प्रभाव बढ़ चुका था और उसका असर भी दिखा. अक्षय प्रताप ने यहां से रत्ना सिंह को शिकस्त दे दी. इसके बाद 2009 में रत्ना सिंह और गोपाल जी का फिर से मुकाबला हुआ और रत्ना सिंह ने यहां कांग्रेस के झंडे को बुलंद करते हुए जीत हासिल की.

2014 के लोकसभा चुनाव में हर जगह की तरह यहां भी मोदी लहर थी. सपा ने यहां से अक्षय प्रताप को उम्मीदवार भी नहीं बनाया. उनकी जगह पर प्रमोद पटेल मैदान में उतरे. बीजेपी अपना दल गठबंधन से यह हरिवंश सिंह मैदान में थे. रत्ना सिंह इस बार भी कांग्रेस से मैदान में थी लेकिन इस बार उनका जादू गायब रहा और वो तीसरे स्थान पर रहीं. अपना दल से हरिवंश सिंह चुनाव जीतने में कामयाब रहे. उन्हें 3,75,789 वोट मिले और उन्होंने बीएसपी के निजामुद्दीन सिद्दीकी को एक लाख 68 हजार से ज्यादा वोटों से शिकस्त दी.

अब बात करते हैं इस चुनाव में चुनौतियों की. राजा भइया इस बार अपनी अलग जनसत्ता पार्टी बनाकर मैदान में हैं. पहले खबरें थी कि बीजेपी के साथ उनका गठबंधन होगा लेकिन फिर ऐसा संभव नहीं हुआ. उन्होंने प्रतापगढ़ और कौशांबी दो सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं. प्रतापगढ़ से उनके चचेरे भाई अक्षय प्रताप सिंह एक बार फिर से मैदान में हैं.दूसरी तऱफ कांग्रेस से रत्ना सिंह एक बार फिर से मैदान में होंगी. इस तरह प्रतापगढ़ के दो पुराने सियासी परिवार फिर से टकराते दिखेंगे. बीजेपी ने यहां से संगमलाल गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है, वहीं महागठबंधन से अशोक त्रिपाठी मैदान में हैं. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में संगमलाल गुप्ता अशोक त्रिपाठी को हरा चुके हैं.

अब यहां के जातीय और धार्मिक समीकरणों पर गौर करते हैं.प्रतापगढ़ लोकसभा सीट पर 2011 के जनगणना के मुताबिक कुल जनसंख्या करीब 23 लाख है. अनुसूचित जाति की आबादी इस सीट पर 19.9 फीसदी है जबकि अनुसूचित जनजाति की आबादी 0.03 फीसदी है. इसके अलावा प्रतापगढ़ संसदीय सीट पर राजपूत और कुर्मी मतदाताओं के साथ-साथ ब्राह्मण मतदाता काफी निर्णायक भूमिका में हैं. जबकि 14 प्रतिशत मुस्लिम आबादी भी है. अलग जातियों की संख्या को देखकर पता चलता है यहां उम्मीदवारों का चयन पार्टियों ने कैसे किया है.

इन समीकरणों पर गौर करें तो यहां सीधे तौर पर कोई भी पार्टी उम्मीदवार मजबूत नजर नहीं आता. अनुसूचित जाति और जनजाति के वोटर बीएसपी के पक्ष में जा सकते हैं. दूसरी तरफ मुस्लिम वोटरों का बंटवारा कांग्रेस और महागठबंधन के बीच हो सकता है. अगर बीजेपी की बात करें तो उन्हें उनके कोर वोटर के साथ कुर्मी वोटर का भी साथ मिल सकता है क्योंकि अपना दल के साथ उनका गठबंधन है और क्षेत्र की 5 विधानसभा सीटों में से तीन पर अपना दल का कब्जा भी है.इस बीच सभी दलों की मुश्किलें राजा भइया भी बढ़ाएंगे. क्षेत्र के लोगों में उनका अपना प्रभाव है. पहली बार वो पार्टी बनाकर मैदान में हैं तो जीतने की कोशिश भी जरूर करेंगे. उनके प्रत्याशी सबसे ज्यादा मुश्किल बीजेपी की बढ़ाएंगे क्योंकि ठाकुर जाति के लोग उनके और बीजेपी दोनों का वोटर है.

कुल मिलाकर प्रतापगढ़ का चुनाव एक बड़ी माथापच्ची है. यहां वोटर का वोट ही ये फैसला करेगा कि अंतिम समय में कौन ये जंग जीतने वाला है. राजा भइया की पार्टी को चुनाव आयोग ने फुटबॉल खेलते हुए खिलाड़ी का चुनाव चिन्ह आवंटित किया है. वाकई में प्रतापगढ़ का चुनाव फुटबॉल का मुकाबला ही बन चुका है जिसमें शायद पेनल्टी शूटआउट में ही विजेता का फैसला होने वाला है.