राहुल गांधी का मास्टर स्ट्रोक कही जाने वाली योजना न्याय कई बड़ी कमियां हैं. अंग्रेजी अखबार इकोनॉमिक टाइम्स के सलाहकार संपादक स्वामीनाथन अय्यर ने अपने एक लेख में इन कमियों का जिक्र किया है. टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखे अपने लेख में अय्यर बताते हैं की किस तरह से इस योजना में निचले स्तर पर भ्रष्टाचार हो सकता है और धन की कमी भी एक बड़ा मुद्दा है. गौरतलब है की हाल ही में राहुल गांधी ने केंद्र में सरकार बनने पर देश के 50 मिलियन परिवारों को 72 हजार रूपए साल में देने का वादा किया था.

अय्यर अपने लेख में लिखते हैं की इंदिरा गांधी ने 1971 में गरीबी हटाओ का नारा दिया था और चुनाव में जीत हासिल की थी. राहुल गांधी भी अब उसी फॉर्मूले पर चलते हुए दिखाई पड़ते हैं लेकिन जिस तरह से गरीबी हटाओ का नारा फेल हुआ था उसी तरह से राहुल गांधी की न्याय योजना भी दोषपूर्ण हैं. मोदी सरकार की किसान योजना में खर्च 75 हजार करोड़ का हुआ है.बगैर राजकोषीय घाटे के ऐसा संभव नहीं है. राहुल गांधी की न्याय योजना के लिए इससे 5 गुना ज्यादा धन की जरूरत होगी.यानि करीब 36 लाख करोड़ धन की जरूरत होगी जो की भारत की कुल GDP का 1.8 फीसदी है.

अय्यर ने योजना पर सबसे बड़ा सवाल निचले स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार को लेकर उठाया है.वो लिखते हैं की भारत में सबसे गरीब 20 फीसदी आबादी की पहचान करना सबसे मुश्किल काम होगा. भारत में आय को लेकर कोई सर्वे नहीं होता है. लोग योजना के अंतर्गत आने के लिए अपनी वास्तविक आय को छिपाएंगे.तमाम फर्जी आय प्रमाणपत्र के जरिए गांवों में अधिकारी और प्रधान भ्रष्टाचार करेंगे. ऐसे में सबसे ज्यादा झूठ बोलने वाले लोग सबसे ज्यादा फायदे में होंगे.गांवों में वैसी भी आज भी एक बड़ी आबादी ऑनलाइन कैश ट्रांसफर से दूर है.ऐसे में वहां भ्रष्टाचार की गुंजाइश और भी ज्यादा बढ़ जाएगी. वो आगे लिखते हैं,"NYAY निचले मध्यम वर्ग के 20-40% की तुलना में सबसे गरीब 20% को अमीर बना देगा, जो हॉवेल के अनुसार यह अनियमित और अनुचित है."

योजना पर एक और सवाल उन्होंने इस पर होने वाले खर्च को लेकर उठाया है.योजना के लिए धन केंद्र सरकार कैसे जुटाएगी ? अगर जीएसटी में इजाफा किया जाता है तो ये नई मुद्रा छापने जितना महंगा होगा.अगर वो कारपोरेट टैक्स बढ़ाते हैं तो एशिया के प्रतिद्वंदी देशों के मुकाबले कम टैक्स रखने की पॉलिसी कमजोर पड़ेगी.अगर इनकम टैक्स की बात करें तो ये भारत की कुल जीडीपी मुश्किल से 2 फीसदी होगा.फौरन इसे डबल करना मुश्किल होगा.अगर आप इनकम टैक्स में ज्यादा इजाफा करते हैं तो ब्लैक इकॉनामी बनने की संभावना बढ़ जाती है.इसका कारण है की लोग टैक्स देने से बचने के रास्ते ढूंढने लगते हैं.इंदिरा गांधी ने इनकम टैक्स में करीब 98 फीसदी का इजाफा किया था.मनमोहन सिंह और चिदंबरम ने इसे बाद में इसमें 50 से 30 फीसदी तक की गिरावट की.

अगर राहुल गांधी उस वक्त शिक्षा,स्वास्थ्य और अन्य आधारभूत ढांचे पर होने वाले खर्च में कटौती करते हैं तो वो भी ठीक नहीं होगा.इन सभी क्षेत्रों में वैसे भी खर्च बढ़ाए जाने की जरूरत है.राहुल गांधी वैसे भी तमाम सब्सिडी को बढ़ाने की वकालत करते रहे हैं.अगर योजना के लिए कर्ज लिया जाता है तो इससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा.ब्याज दरें भी बढ़ेंगी.इससे व्यापार पर गलत असर पड़ेगा.बढ़ी हुई ब्याज दरों से सरकार के खर्च बढ़ेंगे.व्यापार पर घाटा भी बढ़ेगा.रूपये की हालत कमजोर होगी.इससे अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ेंगी.

स्वामीनाथन अय्यर ने अपने लेख में कुछ वामपंथी अर्थशास्त्रीयों के बारे में भी लिखा है जिन्होंने राहुल गांधी के इस मास्टरस्ट्रोक पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.चुनाव के पहले भले ही राहुल गांधी ने इस योजना को लागू करने की बात कहकर बड़ा दांव खेला है लेकिन शायद मिलने पर भी उनके लिए इस राह पर चलना मुश्किल होगा.