कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों के लिए कल अपना घोषणापत्र जारी किया.कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोनिया गांधी,पूर्व पीएम मनमोहन सिंह की मौजूदगी में ये घोषणापत्र जारी किया.कांग्रेस के अनुसार रोजगार और किसानों की समस्या उनके लिए सबसे अहम मुद्दे हैं.रोजगार की ही कड़ी में राहुल गांधी ने एलान किया है की अगर उनकी सरकार बनती है तो 2020 तक वो 22 लाख खाली सरकारी पदों को भर देंगे.भले ही राहुल गांधी ने ये एलान कल किया हो लेकिन कई दिन पहले ट्वीट करके वो इसका एलान कर चुके थे.

कांग्रेस ने इस मुद्दे को चुनावी घोषणापत्र में यू हीं नहीं शामिल किया है.दरअसल बेरोजगारी के मुद्दे पर मोदी सरकार का प्रदर्शन खराब रहा है.निजी क्षेत्र में रोजगार की हालत बेहतर नहीं रही है.बीजेपी ने भी 2014 में अपने घोषणापत्र में रोजगार देने का वादा किया था.बीजेपी ने घोषणापत्र में 2 करोड़ रोजगार देने का वादा किया था लेकिन मोदी सरकार ये वादा पूरा करने में नाकाम रही.जब निजी क्षेत्र में रोजगार की जरूरत थी उस वक्त सरकारी नौकरियों में भी हालत कुछ ठीक नहीं रही.सरकारी नौकरियों के इस मोर्चे पर कई तरह की चुनौतियां थीं जिनसे में भी सरकार निपटने में सफल नहीं हुई.सरकारी पदों पर नौकरियों का न निकलना,पदों के निकलने पर पेपर लीक होना और तमाम कानूनी पचड़ों के बीच सरकारी नौकरियों की हालत खराब रही.दीवाली के बीच देश की राजधानी दिल्ली में तमाम छात्रों ने एक लंबा प्रदर्शन किया.ये प्रदर्शन SSC परीक्षा देने वाले छात्र कर रहे थे.दरअसल SSC भी परीक्षा के पेपर लीक होने की बीमारी का शिकार रहा है और छात्र सरकार से पेपर रद्द करने और सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे.रेलवे समेत तमाम सरकारी नौकरियों में रोजगार ढूंढने वाले युवाओं को इसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा.खास बात ये है की सरकार पूरे 5 साल में इसका तोड़ नहीं ढूंढ पाई.

राहुल गांधी ने भी वादा जरूर किया है लेकिन इसे पूरा करना बिल्कुल भी आसान नहीं होगा.उन्होंने जितने कम वक्त में ये काम करने का दावा किया है उससे बिल्कुल भी उनके वादे पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.दरअसल पेपर लीक से लेकर तमाम विसंगतिया एक पूरे सिस्टम का हिस्सा बन चुकी हैं.ये एक भ्रष्ट सिस्टम बन चुका है जिसे ठीक करना इतना आसान नहीं है.पेपर लीक के पीछे बड़े बड़े गिरोह काम करते हैं.इनकी पहुंच कहां तक है ये जानना मुश्किल है.उसके बाद सभी को खुश करने का प्रयास भी एक बाधा है.कई बार परीक्षाओं के दौरान ऐसी शर्ते लगाई जाती हैं जिनसे नाराज होकर कोई एक पक्ष कोर्ट चला जाता है और सालों परीक्षाओं के रिजल्ट पर रोक लगी रहती है.राहुल गांधी के वादे की खासियत ये है की वो नौकरी देने की बात तो कर रहे हैं मगर सिस्टम की इन खामियों पर बात नहीं कर रहे.अगर अभी बात नहीं कर रहे तो सरकार बनने के बाद भला इतने कम वक्त में कैसे कमियों को दूर करके वो देश को 22 लाख रोजगार देने वाले हैं ये बात वही बता सकते हैं ?

दूसरा एक बड़ा पहलू धन की कमी का है.अगर नौकरियों का एलान करके और परीक्षा करवाकर नौकरी देना होता तो मोदी सरकार ही कब का ये काम कर चुकी होती.एक तरफ राहुल गांधी न्याय जैसी सरकारी खजाने पर बोझ डालने वाली योजना का भी वादा कर चुके हैं.दूसरी तरफ वो सरकारी नौकरियों से भी जुड़ा वादा कर रहे हैं.सवाल ये है की इन महंगे वादों के लिए धन कहां से आएगा.पिछली कांग्रेस सरकार ने किसानों की कर्जमाफी का एलान किया था.नतीजा सरकार तो दोबारा कांग्रेस की बन गई मगर महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी.जिस तरह के वादों का एलान राहुल गांधी कर रहे हैं उसके लिए उन्हें एक आय योजना भी पेश करनी चाहिए.वो न्याय और बड़े लेवल पर नौकरियों जैसी जरूरतों को कैसे पूरा करने वाले हैं ये उन्हें बताना चाहिए.अगर सरकार की आय बढ़ाने का कोई सकारात्मक उपाय राहुल गांधी और कांग्रेस के पास नहीं है तो किसी को इस बात पर शक नहीं होना चाहिए की लोगों ने वादे नहीं कर रहे हैं बल्कि जुमलेबाजी कर रहे हैं.