पीएम मोदी के बारे में एक बात कही जाती है कि वो बोलते बहुत हैं. कहा जाता है कि वो बोलने के लिए कोई न कोई मौका भी जरूर ढूंढ लेते हैं. वैसे तो पीएम 2002 में गुजरात के सीएम बनने के बाद लोगों के बीच जाना पहचाने गए लेकिन जब से उन्होंने पीएम पद के लिए उम्मीदवारी पेश की वो हमेशा मीडिया में छाए रहे. 2014 का चुनाव वो आक्रामक अंदाज में लड़े. खूब इंटरव्यू दिए , इनमें से कुछ में विवादित बयान भी उन्होंने दिए. कुल मिलाकर लोगों को उम्मीद थी कि चुनाव खत्म होने के बाद पीएम के तेवरों में कमी आएगी. चुनाव खत्म हो गए लेकिन पीएम शांत नहीं हुए. उन्होंने मन की बात की शुरूआत की. तमाम योजनाओं की शुरुआत भी उन्होंने अलग अलग जगहों से की हर बार ऐसे मौकों को रैली में बदला. विरोधियों पर जमकर हल्ला बोला. ट्विटर पर तो सक्रिय वो रहते ही हैं. कई बार किसी अपराध या हादसे पर जब उन्होंने कोई ट्वीट नहीं किया और उन पर संवेदनहीन होने के आरोप लगे तब भी उन्होंने अलग अलग मंच से जाकर उन मुद्दों पर गंभीरता से बात की.

वो विदेशी दौरों पर जाते थे वहां भी जोर शोर से बड़े प्रोग्राम होते थे. उनमें भी पीएम खूब बोलते थे. अमेरिकी संसद को भी उन्होंने संबोधित किया. पीएम मोदी बोलते थे और टीवी के पर्दे पर छा जाते थे. मीडिया पर आरोप लगे कि वो हमेशा मोदी मोदी करता रहता है. दरअसल लोग मोदी को सुनना पसंद करते थे और मोदी जी बोलना पसंद करते थे तो मीडिया की भी मजबूरी थी. उनकी टीआरपी काफी कुछ मोदी जी पर निर्भर थी.

2014 से 2019 तक 5 साल में हमेशा ऐसा लगा कि जैसे पीएम हर वक्त चुनाव के मोड में ही रहते हैं. 2019 के चुनाव में तो पीएम ने 145 रैलियां कीं. वहीं उनके मुख्य विपक्षी राहुल गांधी ने 115 रैलियां की. पीएम पद की जिम्मेदारी के साथ उन्होंने जिस तरह चुनावी सभाएं कि उसकी तारीफ भी हुई. मोदी जी चुनाव जीते तो 23 मई की शाम को ही जनता को संबोधित किया. उसके बाद भी उन्होंने कई भाषण दिए जिनकी खासी तारीफ हुई.

राष्ट्रपति के अभिभाषण का उन्होंने दोनों सदनों में उन्होंने जवाब दिया. जनता से दूसरे कार्यकाल में मन की बात भी की लेकिन इन दिनों पीएम मोदी शांत हैं. वो टीवी के पर्दे से गायब हैं. उनका कोई भाषण नजर नहीं आता. वो जापान में जी-20 सम्मेलन में गए, वहां उन्होंने औपचारिक कार्यक्रमों में भाग लिया. भारत का पक्ष रखा, भारतीय समुदाय से मिले भी लेकिन कोई मेगा शो या भाषण नहीं दिया. यदा कदा किसी मुद्दे पर उनके बेहद सरकारी से ट्वीट टीवी पर नजर आते हैं. वो पार्टी से लेकर सरकारी बैठकें करते हैं. सबमें अपनी बात कहते हैं लेकिन सार्वजनिक तौर पर खुद कुछ नहीं बोलते. सारी खबरें निकलकर जरूर आती हैं. हाल ये है कि टीवी मीडिया को बरेली की साक्षी मिश्रा के शादी से जुड़े विवाद को हफ्ते भर चलाना पड़ रहा है. हालांकि बीती 6 जुलाई को वो सदस्यता अभियान की शुरूआत करने बनारस गए थे. वहां उन्होंने बीजेपी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया था.

पीएम के इस शांत व्यवहार के बीच अमित शाह की सक्रियता जरूर खबरों में जगह बना रही है. वो लोकसभा में आक्रामक अंदाज में पेश आते हैं और टीवी स्क्रीन पर छा जाते हैं. कभी कोई बिल पेश करते हुए तो कभी विपक्ष को डांटते हुए उनको वीडियो खूब वायरल होते हैं. ऐसा लगता है जैसे अमित शाह ने पीएम मोदी से उनका काम बांट लिया हो. आने वाले कुछ महीनों में झारखंड, महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनाव है. कांग्रेस आपसी कलह से जूझ रही है. रोज उनकी आपसी कलह खबर बनती जा रही है. बिहार में चमकी बुखार के कहर ने नीतीश को निशाने पर लिया. अब वहां बाढ़ आ चुकी है निशाने पर एक बार फिर से नीतीश ही होंगे. कर्नाटक की राजनीति भी हर एक दो महीने में मतलब भर की फुटेज ले ही लेती है. बाकी मीडिया भी कुछ न कुछ चलाने के लिए ढूंढ ही लेता है.

ऐसा लगता है कि कांग्रेस, नीतीश के खबरों में बने रहने से पीएम को थोड़ा वक्त मिला है. खास बात ये है कि ये दोनों नकारात्मक वजहों से चर्चा में आते हैं. बीजेपी की तरफ से अमित शाह मतलब भर का मोर्चा संभाले ही हुए हैं. शायद मोदी जी इस बार वाकई बोलने से ज्यादा कुछ काम करना चाहते हैं. चूंकि वक्त मुफीद है तो मीडिया की कोई दिक्कत नहीं है. फिर क्या पता दूर कि सोचने वाले पीएम 2024 चुनाव की तरफ देख रहे हों. जहां वो खुद सरकार के मैदान में उतरने के लिए फिट न पाते हों. खैर वक्त बलवान तो होता है लेकिन उसकी जवाबदेही भी होती तो सारे सवालों के जवाब भी उसी को देने होंगे.....