महाराष्ट्र में लंबी सियासी उठापटक के बाद आखिरकार राष्ट्रपति शासन लग गया. हालांकि शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस जब अपना समझौता कर लें उस वक्त ही उन्हें सरकार बनाने का मौका मिल जाएगा. इसलिए राष्ट्रपति शासन लगने के बावजूद भी महाराष्ट्र में सत्ता के लिए नए नए समीकरण बनते नजर आ सकते हैं. महाराष्ट्र के बहाने एक बार फिर से अवसरवाद की राजनीति पर चर्चा शुरु हुई. ऐसा पिछली बार तब हुआ था जब हरियाणा में जेजेपी ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी.

महाराष्ट्र में अवसरवादी राजनीति की चर्चा इसलिए शुरु हुई क्योंकि शिवसेना ने सरकार बनाने के लिए कांग्रेस और एनसीपी की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया. वो भी अपने 30 साल पुराने साझीदार को छोड़कर. अवसरवाद की इस राजनीति की चर्चा वैसे अब पुरानी हो जानी चाहिए. ज्यादा पीछे न जाएं तो पिछले कुछ दिनों में ही इस तरह के उदाहरण खूब मिले. 2015 में लालू प्रसाद यादव की आरजेडी और नीतीश कुमार की जेडीयू एक साथ मिलकर चुनाव लड़े. ये गठबंधन बेमेल था. नीतीश कुमार लालू के जंगलराज के खिलाफ ही आवाज उठाकर सत्ता में आए थे. नरेंद्र मोदी के पीएम उम्मीदवार बनने के बाद बीजेपी से उनका गठबंधन टूट गया. बीजेपी का प्रभाव बिहार में बढ़ रहा था. ऐसे में नीतीश कुमार ने लालू के साथ गठबंधन किया, चुनाव लड़े और जीते भी लेकिन कुछ ही वक्त बाद नीतीश को लगा कि आरजेडी के साथ सरकार चलाना मुश्किल होगा. ऐसे में उन्होंने गठबंधन तोड़ा और बीजेपी का हाथ फिर से थाम लिया. जिस बीजेपी को उन्होंने सांप्रदायिक बताया उसी के साथ सरकार बना ली. फिलहाल खींचतान के बीच बिहार में एनडीए की सरकार ही है.

2014 में चुनाव जीतने के बाद मोदी लहर में बीजेपी ने जम्मू कश्मीर में भी विजय पताका फहराई. चुनाव में बीजेपी को 25 और पीडीपी को 28 सीटें मिलीं. बगैर गठबंधन के सरकार बनना मुश्किल था. ऐसे में बीजेपी और पीडीपी ने गठबंधन किया. बीजेपी ने इस गठबंधन के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विचारधारा वाली नींव को भी दांव पर लगा दिया. सरकार बनने के कुछ दिन बाद ही मशर्रत आलम नाम के एक कुख्यात अलगाववादी को छोड़ा गया. इस फैसले की भी खासी आलोचना हुई. कुल मिलाकर बेमेल गठबंधन से बनी यह सरकार 19 जून 2018 को गिर गई. बीजेपी ने समर्थन वापसी का एलान कर दिया. उसके बाद की जम्मू कश्मीर की अलग ही कहानी है और वो ऐतिहासिक भी है.

2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 2017 में भी यूपी में एसपी बीएसपी की दुर्गति हुई. ऐसे में एक दूसरे के खिलाफ आरोप- प्रत्यारोप से लेकर साजिश तक करने वाले एसपी-बीएसपी एक साथ आ गए. फिर भी इन दोनों ने कम से कम चुनाव के पहले ही गठबंधन कर लिया था. 2019 के लोकसभा चुनाव में फिर से दोनों पार्टियों को बड़ी हार का सामना करना पड़ा. बीजेपी को इतनी सीटें ही मिल गईं कि केंद्र में जोड़-तोड़ का कोई खेल ही नहीं बचा वर्ना इस गठबंधन को लेकर नए रंग नजर आ सकते थे. हालांकि बीएसपी ने गठबंधन तोड़ा ही लेकिन फिर भी एसपी पर गुंडोवाली या भ्रष्टाचारी पार्टी होने का आरोप नहीं लगाया.

बीते लोकसभा चुनाव में ही विचारधारा एक समझौते का एक अलग मामला सामने आया था. जब अरविंद केजरीवाल जी कांग्रेस के साथ गठबंधन को लालायित थे. उन्होंने अंतिम वक्त तक गठबंधन के प्रयास किए. अन्ना आंदोलन से लेकर दिल्ली की सत्ता हासिल करने के दौर में केजरीवाल जी ने कांग्रेस को कहीं का नहीं छोड़ा था. कांग्रेस की दिवंगत नेता शीला दीक्षित को इस बात का इल्म भी था और इसीलिए उन्होंने गठबंधन से इंकार कर दिया. कांग्रेस के मना करने से ही गठबंधन नहीं हो पाया वर्ना आम आदमी पार्टी तो अपनी विचारधारा कब की बेच चुकी थी.

भारतीय राजनीति के यह रंग बीते कुछ सालों के ही हैं और ज्यादा पीछे जाएंगे और भी उदाहरण सामने आएंगे. सत्ता के लिए इस तरह के गठबंधन देखकर आपको समझ जाना चाहिए कि सत्ता का कोई एक रंग नहीं है. गिरगिट तो फिर भी हालात के मुताबिक कई रंग बदल सकता है लेकिन राजनीति में कोई भी रंग तय नहीं है. राजनेता जैसे हालात देखते हैं वैसा ही रंग धारण कर लेते हैं और वो कोई भी रंग हो सकता है. फिलहाल आने वाले कुछ दिनों में बिहार और पश्चिम बंगाल में चुनाव हैं. दिल्ली में भी विधानसभा चुनाव हैं. वहां भी राजनीति के ऐसे ही रंग देखने को मिल सकते हैं. भूलकर कहीं आप राजनीतिक नैतिकता और विचारधारा की बहस मत करने शुरु कर दीजिएगा.