दोस्तों कल के अंक में हमने बात की पप्पू नाम की एक परिकल्पना की.किस तरह से एक व्यक्ति के लिए एक विशेष संदर्भ में प्रयोग होने से भारतवर्ष के तमाम पप्पुओं की मानहानि हुई है.इसमें हमने ये भी बताया की इस परिकल्पना का जन्म सोशल मीडिया पर हुआ था.अब हम बात करते हैं दूसरी परिकल्पना चाणक्य की.इसके बारे में खास बात ये है की ये परिकल्पना भारतीय मीडिया की देन हैं.

रोचक टॉप और स्लग और हेडलाइन की तलाश में रहने वाला मीडिया अक्सर इस तरह की दुर्घटनाएं कर बैठता है.खैर ये महज यूं नहीं हुआ.दरअसल 2014 के चुनाव में जिस तरह से अमित शाह के नेतृत्व में यूपी में बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की.उसके बाद कई विधानसभाओं में भी उनके नेतृत्व में बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की.कुछ राज्य ऐसे में थे जिनमें जोड़ तोड़ और विपक्षी विधायकों को पाले में करना था.अमित शाह ने इसमें भी सफलता हासिल की.ऐसे में मीडिया ने उन्हें चाणक्य की संज्ञा से नवाजना शुरू कर दिया.

वो चाणक्य जिन्होंने एक प्रतिज्ञा लेने के बाद नंद वंश का विनाश करवाया था और चंद्रगुप्त मौर्य को राजा बनवाया था.इन्ही चाणक्य ने अर्थशास्त्र भी लिखा.उस चाणक्य के समकक्ष में मीडिया ने अमित शाह को खड़ा कर दिया.चुनाव जीतने के बाद बेहतरीन जोशीले अंदाज में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले अमित शाह बेशक एक बड़े रणनीतिकार हो सकते हैं.वो जिस तरह से अकेले दम पर भी चुनाव लड़ने का माद्दा दिखाते हैं वो शानदार होता है.लेकिन क्या वो इतने बड़े रणनीतिकार हैं की उन्हें चाणक्य कहा जाए.

बीते दिनों तीन राज्यों में हार के बाद से मीडिया के इस चाणक्य ने एक भी प्रेस कॉ़न्फ्रेंस उन चुनावों के मुद्दे पर नहीं की.यहां तक जब राफेल पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से गदगद अमित शाह से उन हारों के बारे में सवाल पूछा गया तब भी अमित शाह अलग से प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की बात कहकर प्रश्न को टाल गए.क्या वाकई चाणक्य ऐसे ही थे.

त्रिपुरा चुनावों के वक्त को याद करिए.बीजेपी जीती और पीएम के साथ अमित शाह बीजेपी हेडक्वार्टर में शानदार अंदाज में हाथ हिलाते हुए पहुंचे.पीएम ने जोरदार भाषण भी दिया.वही बीजेपी हेडक्वार्टर तब खाली हो गया जब तीन राज्यों में बीजेपी के हाथ से सत्ता चली गई.गंभीरता से अगर देंखे तो वाकई इन सब के बाद अमित शाह को चाणक्य बताना वाकई चाणक्य का अपमान है.

बेशक संज्ञा देने को मतलब किसी का हूबहू होना ही नहीं होता लेकिन अमित शाह की मनोदशा को समझिए जब बीजेपी हारी तब क्या रही होगी.विरोधियों पर जोरदार प्रहार करने वाला व्यक्ति इस तरह से मुंह छुपा ले तो कैसा लगता है.उसके चाणक्य जैसा होने की अनुभूति तो नहीं होती.अमित शाह बेशक बड़े राजनीतिज्ञ हैं लेकिन बीजेपी में आडवाणी,मुरली मनोहर जोशी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसा नेता भी अपने आप में बेहद महान नेता रहे हैं जिन्होंने शून्य से बीजेपी को खड़ा और राष्ट्रीय पार्टी बनाया.ऐसे में अमित शाह पहले नहीं हैं जो ये काम कर रहे हैं.

कुल मिलाकर अगर राहुल गांधी को पप्पू को कहे जाने के लिए असली पप्पुओं को मानहानि का केस करना चाहिए तो एक केस भारतीय मीडिया पर चाणक्य जी के नाम से एक मानहानि का होना चाहिए....