2015 का बिहार चुनाव याद कीजिए. पूरे भारत में प्रचंड बहुमत से जीतने वाली बीजेपी, बिहार भी जीतने का ख्वाब संजोए थी. उपेंद्र कुशवाहा, रामविलास पासवान और जीतनराम मांझी बीजेपी के गठबंधन में साथी थे. बीजेपी आक्रामक अंदाज में चुनाव प्रचार कर रही थी. दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार का गठबंधन था. पीएम मोदी करारे हमले कर रहे थे. उन्होंने नीतीश कुमार के डीएनए में गड़बड़ी बता दी. नीतीश कुमार ने इसे बिहार की जनता का अपमान बताया. उस वक्त बिहार की जीडीपी की चर्चा होती थी, नीतीश कुमार विकास पुरुष थे. मीडिया के एक वर्ग और बुद्धिजीवियों का पूरा समर्थन उनके साथ था और फिर चुनाव का नतीजा तो सबको मालूम ही है. नीतीश को 2019 के लिए विपक्ष का चेहरा बताया जाने लगा. बिहार में बीजेपी की बड़ी हार के पीछे, नीतीश का विकल्प खोज न पाना था. बीजेपी, मोदी जी के चेहरे के सहारे कई राज्यों में चुनाव जीती लेकिन बिहार में जनता ने राज्य के चेहरे को चुना. कुल मिलाकर 5 साल पहले बिहार में नीतीश कुमार, पीएम मोदी पर भारी पड़ गए थे. लेकिन अब?

5 साल के भीतर बिहार की सियासत बदल चुकी है. पहले चरण की वोटिंग के बाद, कुछ युवाओं से बात करते हुए एक न्यूज चैनल की रिपोर्ट देखी. ये युवा वो मजदूर थे जो लॉकडाउन में पैदल चलकर घर पहुंचे थे. नीतीश कुमार से बहुत नाराजगी थी. साफ कह रहे थे कि नीतीश को वोट नहीं देना है लेकिन बीजेपी को जमकर सपोर्ट कर रहे थे और बीजेपी की वजह से ही अपनी सीट पर जेडीयू तो वोट देकर आए थे. बीजेपी और पीएम मोदी के खिलाफ लगातार लिखने वाला मीडिया भी मान रहा है कि बिहार में मोदी और बीजेपी की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं है. डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, उज्जवला, शौचालय और मकान जैसी सुविधाओं की वजह से जनता पीएम मोदी से खुश है. नीतीश कुमार से नाराजगी है लेकिन बीजेपी नहीं. बिहार में विपक्ष में सही चेहरा न होना भी एक बड़ी वजह है. आरजेडी के परंपरागत वोटर को छोड़ दें तो बाकी वोटर 'जंगलराज' की वापसी नहीं चाहते. यही वजह है कि जनता बीजेपी में एक विकल्प ढूंढने का प्रयास कर रही है.

तेजस्वी यादव की सभाओं में जुटी भीड़ और नीतीश के कमजोर पड़ने की रिपोर्ट ने शायद बीजेपी को सचेत किया है. ऐसा लग रहा था कि बीजेपी नीतीश को कमजोर करना चाह रही थी लेकिन यहां स्थिति जेडीयू के सफाए तक की बनती लग रही है. ऐसे में पीएम मोदी ने नीतीश के जंगलराज की लाइन को ही आगे बढ़ाना चालू कर दिया है. पीएम मोदी ने तेजस्वी यादव को जंगलराज का युवराज बताया है. दूसरी तरफ बीजेपी के कथित आशीर्वाद से चुनाव लड़ रही लोजपा के नेता चिराग पासवान का एक वीडियो वायरल हो गया. इस वीडियो ने उनकी छवि को खासा नुकसान पहुंचाया है. जाहिर सी बात है कि ये वीडियो उनके किसी नजदीकी या पीआर टीम से लीक किया गया है. मना नहीं किया जा सकता कि इसमें उसी पार्टी का हाथ हो जिसका आशीर्वाद साथ होने का दावा चिराग पासवान करते रहे हैं.

बीजेपी को शायद भनक लग चुकी है कि हवा का रुख जेडीयू के बहुत ज्यादा खिलाफ है और इसका बड़ा फायदा आरजेडी को मिल सकता है. आरजेडी बड़े फायदे की हालत में आए, बीजेपी ऐसा बिल्कुल नहीं चाहेगी. यही वजह है कि अब बीजेपी नीतीश की लाइन पर ही चल चुकी है. कई लोगों का मानना है कि बिहार में पीएम मोदी की तीन रैलियां गेमचेंजर साबित हो सकती हैं. बाकी तेजस्वी यादव का राजपूतों के खिलाफ बयान और उनका समर्थक को घसीटते हुए एक वी़डियो भी आरजेडी के खिलाफ जा सकता है.

कुल मिलाकर बिहार चुनाव एक बार फिर पीएम मोदी की छवि के इर्द-गिर्द आ चुका है. आज नीतीश को गद्दी बचाने के लिए पीएम मोदी का सहारा लेना पड़ रहा है. 5 साल पहले की अपनी छवि और रुतबा नीतीश कुमार खो चुके हैं. 6 साल के शासन में तमाम जनविरोधी फैसले लेने का आरोप झेलने वाले पीएम मोदी की छवि और मजबूत हो चुकी है. बिहार में नीतीश पर पीएम मोदी का भारी पड़ना, उनकी बड़ी जीत है. चुनाव नतीजे के बाद अगर नीतीश कुमार अपनी गद्दी भी बचा भी लें तो वो रुतबा और आत्मविश्वास उनके अंदर नहीं दिख पाएगा जिसकी बदौलत पहले वो विकास पुरुष कहे जाते थे. बीजेपी भले 2017 से बिहार में सत्ता में थी लेकिन बिहार में हार तो वो चुकी थी. शायद इस बार भी सीएम की गद्दी उन्हें न मिले लेकिन बिहार वो जीत लेंगे.