जिस 2019 के लोकसभा चुनाव का सबको बेसब्री से इंतजार था वो अब खत्म हो चुका है. मोदी लहर के सामने विपक्ष ने घुटने टेक दिए. मोदी नाम की इस लहर के सामने एक राज्य ऐसा भी है जहां मोदी लहर में भी कमल खूब खिल नहीं पाया. न ही लोकसभा के चुनाव में और विधानसभा के चुनाव में. ये संभव हुआ ओडिशा में लंबे अरसे से सत्ता की गद्दी पर काबिज एक नेता की वजह से जो मीडिया में बेहद कम नजर आता है. दरअसल हम बात कर रहे हैं ओडिशा के सीएम और बीजू जनता दल के अध्यक्ष नवीन पटनायक के बारे में.जो आदमी मीडिया में न ज्यादा आता हो और न ही नेताओं से ज्यादा मिलता हो उसके बारे में क्या कहा जा सकता है.

5 वीं बार ओडिशा की कमान संभालने को तैयार नवीन के बारे में कहा जाता है कि वो अपने राज्य की मातृभाषा को ठीक से नहीं जानते. वो ओडिया बोलने और लिखने दोनों में कमजोर हैं लेकिन सत्ता पर पकड़ की बात करें तो हाल ये है कि वो हर बार पिछले चुनाव से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज करते हैं. नवीन पटनायक और बीजेपी पुराने सहयोगी रहे हैं.2009 में दोनों पार्टियों का गठबंधन टूट गया. आमतौर पर गठबंधन टूटते हैं तो नए बनते भी हैं लेकिन ओडिशा में ऐसा नहीं हुआ. वहां सारे अलग अलग ही रहे. बीजेपी ने बहुत कोशिश की कि वो नवीन को उनके गढ़ में परास्त कर सकें लेकिन वो ऐसा कभी नहीं कर सके. यहां तक कि 2019 चुनाव की मोदी लहर भी नवीन का कुछ बिगाड़ नहीं सकी और यहां बड़ी संख्या में सीटें जीतने का ख्वाब पाले बैठी बीजेपी को 9 सीटें मिलीं. उधर विधानसभा में तो नवीन पटनायक का जादू खूब चला. नवीन पटनायक की बीजेडी ने 147 में से 123 सीटों पर जीत हासिल की.

बीजेपी ने यहां धर्मेंद्र प्रधान को आगे रखकर बीजेपी अपने पुराने सहयोगी पर हमला करने में कोई कोताही नहीं बरती. टीवी पर बीजेपी के बड़े चेहरे माने जाने वाले संबित पात्रा पुरी की उस लोकसभा सीट से चुनाव भी लड़े जहां कभी पीएम मोदी के चुनाव लड़ने की चर्चा थी और संबित को यहां हार का सामना भी करना पड़ा. बीजेपी की नीति इस बार ओडिशा में सरकार बनाने पर पूरा जोर लगाने की थी. पीएम मोदी ने जिन राज्यों में सबसे ज्यादा रैलियां की उनमें ओडिशा तीसरे नंबर पर है. ऐसे में नवीन पटनायक चाहते तो कांग्रेस से हाथ मिला सकते थे. 2015 में बिहार में नीतीश कुमार ने कुछ ऐसा ही किया था.दूसरा रास्ता था कि वो अकेले ही मैदान में बीजेपी से भिड़ जाते जैसा कि वो हमेशा करते रहे हैं. उन्होंने खुद पर भरोसा किया और जीत भी हासिल की.

नवीन पटनायक कम बोलते हैं लेकिन करते बहुत ज्यादा हैं. बीते दिनों ओडिशा में फोनी तूफान से निपटने की तरीके की पीएम मोदी से लेकर संयुक्त राष्ट्र ने भी तारीफ की. ओडिशा के नवीन बाबू देश की राजनीति में तमाम दलों से अलग रहकर, बीजेपी से बगैर जुड़े अपनी एक अलग जुझारू पहचान बनाए नजर आते हैं जो आज के मोदी युग में एक अलग ही छाप छोड़ती है.