साध्वी प्रज्ञा ठाकुर एक बार फिर से विवादों में हैं. उन्होंने लोकतंत्र के मंदिर कही जाने वाली संसद में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहा. उनके बयान के बाद विवाद खड़ा हुआ और प्रज्ञा ठाकुर को लोकसभा में दो दो बार माफी मांगनी पड़ी. इससे पहले भी प्रज्ञा ठाकुर नाथूराम गोडसे को देशभक्त बता चुकी हैं. उस वक्त बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने उन पर कार्रवाई करने की बात कही थी जो कब हुई इसका पता जनता को नहीं चला. लोकसभा में दिए गए बयान को लेकर जरूर उन पर हल्की फुल्की कार्रवाई हुई है. प्रज्ञा ठाकुर के बहाने बार बार नाथूराम गोडसे पर चर्चा शुरु हो जाती है. देशभक्त से लेकर उसे आतंकवादी तक कहा जाता है. आज हम इस विषय के बारे में आपको बताने जा रहे हैं कि नाथूराम गोडसे क्यों देशभक्त और आतंकवादी दोनों नहीं है.

नाथूराम गोडसे देशभक्त क्यों नहीं?

इस सवाल का जवाब वैसे तो बेहद आसान है लेकिन गोडसे को देशभक्त मानने वालों को कुछ बातें समझाना जरूरी हैं. नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की थी. वो महात्मा गांधी जिन्होंने देश की आजादी के आंदोलन को एक अलग दिशा दी. गांधी जी ने देश की आजादी के लिए कई बार बड़े आंदोलन किए और आंदोलनों का तरीका अपने आप में विशेष था. बगैर हिंसा किए हुए हमेशा सच के साथ चलते हुए गांधी जी ने आजादी के आंदोलन को राह दिखाई. आजादी ही नहीं गांधी जी ने देश में सामाजिक बदलाव के लिए भी काम किया. उन्होंने दलितों की दशा सुधारने का प्रयास किया. उन्होंने कुष्ठ रोगियों की सेवा करके एक अलग संदेश दिया. जब आंबेडकर ने दलितों को हिंदू धर्म से अलग करने का प्रयास किया, उस वक्त गांधी जी ही थे जिन्होंने अनशन किया और आखिरकार आंबेडकर को अपनी मांग छोड़नी पड़ी. देश में पंचायतों के जरिए विकास का रास्ता गांधी जी ने ही दिखाया. वो गांधी जी ही थे जिन्होंने चरखा चलाकर सूत काटा और 'स्वदेशी अपनाओ, विदेशी भगाओ' का मंत्र दिया. ऐसे गांधी के सामने जब देश का बंटवारा होने लगा तो उन्होंने कहा कि भारत हमेशा धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र रहेगा, जो मुस्लिम भारत में रहना चाहें वो रह सकते हैं. दरअसल गांधी ने 'एक' भारत के साथ देश को आजाद कराया था और वो उसकी कीमत समझते थे. नाथूराम गोडसे गांधी की उस विचारधारा को समझने में नाकाम रहा और उसने उनकी हत्या कर दी. जिस व्यक्ति ने आजादी से पहले से लेकर बाद तक के लिए भारत को एक दर्शन दिया हो, उसकी हत्या करने वाला कहीं से भी देशभक्त नहीं हो सकता. महात्मा गांधी की हत्या ने देश में एक शून्य पैदा किया और उस वक्त के नेहरु जैसे नेताओं के ऊपर से एक नियंत्रण को खत्म कर दिया. महात्मा गांधी की भूमिका उस वक्त देश के अभिवावक के तौर पर थी और नाथूराम गोडसे ने भारत से उसके अभिवावक को छीन लिया.

नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या करके देश को वैचारिक रुप से पीछे धकेलने की कोशिश की. एक ऐसी व्यक्ति की हत्या कर देना जिसने पूरा आजादी का आंदोलन ही अहिंसा के मंत्र के साथ लड़ा हो, अपने आप में एक जघन्य पाप है. अगर गोडसे गांधी के विचारों से असहमत था तो उसे अपने विचारों के बारे में लोगों को बताना चाहिए था. अहिंसक तरीके से उसे गांधी को परास्त करने की कोशिश करनी चाहिए थी लेकिन गोडसे ने हिंसा का रास्ता चुना, उसने गांधी जी की हत्या कर दी. महात्मा गांधी की हत्या से देश का बहुत नुकसान हुआ और उनकी हत्या करने वाला व्यक्ति कभी भी देशभक्त नहीं हो सकता. लोगों को समझने और बोलने की आजादी है लेकिन भारत में रहकर इस तरह की बातें करना अपने आप में एक पाप है.

गोडसे आतंकवादी क्यों नहीं?

पहले सवाल के मुकाबले दूसरा सवाल का जवाब समझाना थोड़ा कठिन है. इस सवाल का जवाब देने के लिए हमें हालिया समय में हुई आतंकवादी घटनाओं और गांधी जी की हत्या की तुलना करनी होगी. इन तुलनाओं से हमें खुद जवाब मिल जाएगा. आतंकवादी घटनाओं को देखें तो पता चलता है कि एक ऐसी घटना जिसमें किसी खास संदेश को देने के लिए बेवजह निर्दोंषों की जान ले ली जाए, उन्हें डराने की कोशिश की जाए, आतंकवाद के दायरे में आती है. ऐसी घटनाओं में महज एक संदेश देने के लिए आतंकवादी ऐसे लोगों की हत्या तक कर देते हैं जिन्हें वो बिल्कुल जानते तक नहीं.

महात्मा गांधी की हत्या को देखें तो यहां बिल्कुल अलग ही घटनाक्रम था. यहां गोडसे की नजरों में गांधी एक समस्या की जड़ थे. गोडसे को लगता था कि उन्हें खत्म करके वो अपने मकसद में कामयाब हो जाएगा. अगर गोडसे आतंकियों की तरह ही सोच रहा होता तो वो गांधी की बजाय मुस्लिमों की किसी बस्ती पर हमला करता और उनको मार देता, आगे भी हमले की धमकी देता, लेकिन उसने गांधी को मारा क्योंकि उसे लगा कि इस समस्या की जड़ गांधी हैं. आप आतंकियों और गोडसे की तुलना कीजिए और आप को खुद दोनों में अंतर पता चल जाएगा. नाथूराम गोडसे ने जब गांधी की हत्या की तो उसने पहले उनके पैर छुए. जाहिर सी बात है कि गांधी को लेकर एक श्रद्धा का भाव भी गोडसे के भीतर था. कौन सा वो आतंकी है जो मारने से पहले किसी के पैर छूता हो? नाथूराम गो़डसे एक कट्टर विचारधारा के प्रभाव में अंधा होने वाला एक हत्यारा था औऱ उसे बेवजह आतंकवादी बताना गलत है. ऐसा करके आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई को कमजोर ही किया जाता है.