पश्चिमी यूपी की जिन सीटों पर मुकाबला सबसे कड़ा होने वाला है उनमें मुजफ्फरनगर की सीट अहम है.इस सीट पर आरएलडी प्रमुख और चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह मैदान में हैं.उनके खिलाफ बीजेपी से संजीव बालियान ताल ठोक रहे हैं.संजीव बालियान मुजफ्फरनगर से मौजूदा सांसद हैं.वो मोदी सरकार में राज्यमंत्री भी रहे हैं.बीते लोकसभा चुनाव में बागपत से चुनाव हारने के बाद चौधरी अजीत सिंह के लिए ये चुनाव राजनीतिक अस्तित्व का प्रश्न है.वहीं संजीव बालियान के जरिए बीजेपी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जमाए गए अपने पैर को किसी भी हालत में हटता देखना नहीं चाहेगी.

2014 के चुनाव में क्षेत्र में दो अहम फैक्टर थे.मुजफ्फरनगर दंगे और मोदी लहर ने संजीव बालियान की राह आसान की थी.उन्हें करीब 60 फीसदी वोट हासिल हुए थे.2013 में हुए मुजफ्फनगर दंगों के आरोप में संजीव बालियान को बीएसपी के कादिर राणा यहां दूसरे स्थान पर रहे थे और उन्हें 22 फीसदी वोट हासिल हुए थे.सपा के उम्मीदवार को यहां से 14 फीसदी वोट हासिल हुए थे.इस बार के चुनाव में बीजेपी एक अलग ही स्तर पर चुनौती का सामना कर रही है.दरअसल महगठबंधन से इस बार अजीत सिंह मैदान में हैं.कांग्रेस ने उनके खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारा है.परंपरागत जाट वोट बैंक पर उनकी पकड़ है.मुस्लिम वोटरों के लिए वो एकमात्र उम्मीदवार हैं.उन्होंने क्षेत्र में एकता सम्मेलन करके अपने पक्ष में हवा बनाने की कोशिश की है.दूसरी तरफ मौजूदा सांसद संजीव बालियान को सबसे सक्रिय सांसदों में गिना जाता है.पिछड़ी जाति,सामान्य वर्ग और जाटों का समर्थन उनके पास है.कहा जाता है की 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने क्षेत्र में जाटों की नाराजगी दूर करने में अहम भूमिका अदा की थी.

अगर यहां के मतदाताओं के बारे में बात की जाए तो यह मुसलमान बहुल क्षेत्र है. लगभग 17 लाख मतदाताओं के बीच मुसलमानों की संख्या 26 फीसदी है, जिसके बाद 15 फीसदी जाटव और लगभग आठ प्रतिशत जाट हैं.जाहिर तौर पर इस समीकरण को देखकर आप समझ गए होंगे कि अजीत सिंह यहां भारी पड़ने वाले हैं.मुस्लिमों का वोट इस बार बंटने वाला नहीं है.जाटव वोटर भी मायावती का साथ होने के चलते अजीत सिंह के साथ जाना पसंद करेगा.अगर जाट वोटरों की बात करें तो इसमें बंटवारा होना तय है.

बेशक बालियान को बीजेपी के परंपरागत सामान्य वर्ग के वोट बैंक का सहारा होगा.इसके साथ ही गैर यादव पिछड़ा वर्ग को भी वो अपने साथ लाने का प्रयास करेंगे.इन सबके बीच गन्ना किसानों का भुगतान भी एक बड़ा मुद्दा है.बालियान के लिए इस मुद्दे से भी निपटना आसान नहीं रहा होगा.मुजफ्फरनगर के अभी के समीकरण इशारा कर रहे हैं कि चौधरी अजीत सिंह इस बार लोकसभा में नजर आ सकते हैं लेकिन वाकई अगर इस समीकरण को तोड़ने में अगर संजीव बालियान कामयाब रहे तो जाटों के नए नेता के तौर पर वो पहचान बना लेंगे.