आखिर कल वो कार्यक्रम संपन्न हो गया जिसका सभी को बेसब्री से इंतजार था. प्रणब मुखर्जी नागपुर में संघ के मुख्यालय गए उन्होंने हेडगेवार को भारत मां का सपूत बताया हालांकि अपने भाषण में उन्होंने संघ के इतिहास,इसके योगदान या संघ की आलोचना जैसी कोई बात नहीं की. उन्होंने विशुद्ध राष्ट्रवाद पर एक संदेश दिया.इन सबके बीच एक चर्चा बेहद जरूरी हो जाती है और वो ये है कि इस कार्यक्रम के पहले और बाद के संघ में क्या अंतर है. क्या मोहन भागवत संघ के सबसे शक्तिशाली सरसंघचालक बन चुके हैं? क्या अब भी संघ महज वो संगठन है जिसके बारे में सिर्फ तरह तरह की बातें होती थीं और वो पर्दे के पीछे से देश की राजनीति को प्रभावित करता था? कम से कम कल के कार्यक्रम के बाद इन सवालों के जवाब ढ़ूढ़ने चाहिए.

अंग्रेजी शासनकाल के दौरान आरएसएस की स्थापना करना उसको आगे बढ़ाना और आजादी तक उसे इस स्तर पर पहुंचा देना कि वो एक पक्ष के रुप में सामने आए इन सब कामों से बेशक बलिराम हेडगेवार एक योग्य संगठनकर्ता के तौर पर जाने हैं.उनके बाद सदाशिव गोलवलकर ने जिस तरह संघ को आगे बढ़ाया. गांधी जी की हत्या के समय में संघ के कठिन समय में उसको संभाला और आगे भी भाउराउ देवरस और रज्जू भइया ने भी संघ एक मजबूत वैचारिक पक्ष बना रहे ये सुनिश्चित किया.

बीजेपी की स्थापना से लेकर सत्ता प्राप्ति तक के संघ के सफर को हम देखें तो अब तक संघ पर्दे के पीछे से अपने भूमिका निभाता आ रहा है. आदिवासी क्षेत्रों में काम करना,उन जगहों पर काम करना जहां पर बीजेपी का आधार कमजोर है. शिशु मंदिर जैसी संस्थाए तैयार करना ताकि शुरुआत से ही बच्चों को अपनी विचारधारा से जोड़ा जा सके.अटल बिहारी वाजपेई के सत्ता हासिल करने के बाद भी संघ अपने उसी काम में मशगूल रहा. लेकिन आज का संघ कैसा है ? आज का संघ ये दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ता की सत्ता के पीछे उसका हाथ है. मोहन भागवत जिस अंदाज में कल नजर आए वो आज के संघ की एक झलक थी. एक पूर्व राष्ट्रपति को मंच पर बुलाना वो भी जो एक इतना बड़ा पूर्व कांग्रेसी नेता रहा है. जिसने संघ का खुलकर विरोध भी किया है और उसके समकक्ष खड़े होकर भारत की संस्कृति और राष्ट्रवाद पर बातें करना और उसके पार्टी के विरोधी बयानों से ही उसका बचाव करना.

मोहन भागवत ने इस भाषण के जरिए उस पूरी कांग्रेस पार्टी को बहुत पीछे छोड़ दिया जो लगातार प्रणब के संघ के कार्यक्रम में जाने का विरोध कर रही थी. उनके तेवर,उनके तर्क बेहद स्पष्ट थे जो ये बताने की कोशिश कर रहे थे कि संघ अब उस स्थिति में आ चुका है जहां से विरोधी नेता भी उसके अस्तित्व को स्वीकार कर रहे हैं और संघ भी उन्हें अपने मंच से बोलने के लिए जगह दे रहा है.पहली बार भारत में ऐसा हुआ है जब एक सर संघचालक के भाषण को इतने लोगों से टीवी पर लाइव देखा होगा.भारत में बुद्धिजीवियों के समर्थन से हमेशा मरहूम रहे संघ के लिए प्रणब को बुलाना,संघ के मंच पर मोहन भागवत के साथ बैठना ये संघ की उस स्वीकार्यता को अब और बढ़ा देगा.

हालांकि संघ के इस उभार के पीछे आज की राजनीतिक स्थिति और नरेंद्र मोदी का पीएम बनना भी है. दरअसल नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद लोगों ने भी संघ की आलोचना में कोई कसर नहीं छोड़ी. हालत ये है कि सोशल मीडिया पर संघ को रत्तीभर भी न जानने वाले आज बीजेपी समर्थकों को संघी कहकर दुत्कारते हैं.बहुत से पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का भी यही हाल है.ऐसे में संघ के लिए अपनी सामाजिक उपस्थिति को बनाना अब आसान हो चुका है.कहते भी हैं कि नकारात्मकता ज्यादा बिकती है और कांग्रेस ने जिस तरह से कार्यक्रम के पहले प्रणब की खिंचाई की वो अपने आप में इस कार्यक्रम और संघ का कद और बढ़ा गई है.

बेशक बीजेपी अभी सत्ता में है और संघ के विस्तार के लिए ये अनुकूल समय है हालांकि संघ सत्ता के विस्तार पर सत्ता के होने न होने का फर्क कभी नहीं पड़ा है फिलहाल की जो स्थितियां हैं उनमें मोहन भागवत एक बेहद कुशल और चालाक नेतृत्वकर्ता के रुप में नजर आ रहे हैं.चूंकि अभी सत्ता भी है तो वो शक्तिशाली भी हैं लेकिन पूर्व के संघ प्रमुखों का जो काम रहा है उसे देखते हुए ये कहना अभी थोड़ा जल्दबाजी होगी कि मोहन भागवत सबसे शक्तिशाली संघ प्रमुख हैं लेकिन अगर वाकई ऐसे ही वो काम करते रहे तो बेशक उन्हें ये संज्ञा दी जा सकती है.