कोरोना के चलते भारत में लॉकडाउन को लगभग 2 महीने पूरे होने वाले हैं. इस पूरे लॉकडाउन के दौरान देश एक ही तरह की तस्वीरों का गवाह बनता रहा है. ये अनगिनत तस्वीरें भारत की निकम्मी और असंवेदनशील सरकारों की हैं. ये तस्वीरें भारत के सफेदपोश खोखले समाज की हैं. ये तस्वीरें भारत की 'एकता में अनेकता' की हैं और सबसे बड़ी बात ये तस्वीरें हमारे कमजोर प्रधानमंत्री की हैं. भारत की गरीबी और भुखमरी पर पड़ा हल्का फुल्का पर्दा भी हट चुका है और लोग मरते हुए नजर आ रहे हैं.

पीएम मोदी ने 24 मार्च की शाम को 21 दिन के लॉकडाउन का ऐलान किया था. पीएम के ऐलान के एक दिन बाद से ही मजदूरों का पलायन शुरु हो गया था. सरकारों ने ऐलान किए कि हम मजदूरों को खाना देंगे. मकान मालिकों से किराया ना लेने को कहा गया. गरीबों को राशन देने की बात कही गई. कुछ जगहों पर ऐसा हुआ भी लेकिन फिर भी वक्त के साथ सरकारी और तमाम NGO की मदद कम होती गई. मकान मालिकों को किराए में ढील नहीं दी. मजदूरों को लगा कि जब काम बंद है तो यहां गर्मी में बाहर रहने का क्या फायदा. कम से कम अपने घर ही चलें. मजदूरों ने अपने घरों की ओर पलायन शुरु कर दिया. बस, ट्रेन और बाकी साधन बंद थे तो लोग पैदल ही निकल पड़े. गांव कनेक्शन की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दिनों 500 लोगों की मौत लॉकडाउन की वजह से हुई. सरकारों की हालत ये है कि ऐलान किया जाता है लेकिन पालन कौन करवाएगा इसका पता नहीं रहता. सारे विधायक- सांसद ग्राउंड से गायब हैं.

कहीं ट्रक में बैठकर जाते मजदूरों की मौत हो रही है तो कहीं रेल की पटरियों पर लोग मौत की नींद सो रहे हैं. सरकार रोज दावे करती है कि श्रमिक एक्सप्रेस से इतने मजदूर घर गए. केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने दावा किया कि कोरोना संकट के दौरान भारत में भूख से एक भी मौत नहीं हुई. अगर आपकी स्मरण शक्ति ठीक है तो आपको 2014 के पहले कांग्रेस नेताओं के बयान याद होने चाहिए. कांग्रेस नेता भी उस वक्त ऐसे ही बयान देते थे जो जमीनी सच्चाई से एकदम अलग होते थे. संकट के इस समय में पीयूष गोयल का बयान बहुत ही आपत्तिजनक है. अगर मजदूरों को घर पहुंचा ही रही है तो ये कौन है जो भयंकर गर्मी में, तपते डामर की सड़कों पर चलकर अपनी जान गंवा रहे हैं.

आपने ऊपर पढ़ा होगा कि मजदूरों की बदहाली को एकता में अनेकता की तस्वीर बताया गया है. दरअसल संकट के इस समय में आज के भारत की तस्वीर अनेकता में एकता की भारत की विशेषता से एकदम अलग नजर आ रही है. आज भारत के राज्य दूसरे राज्यों के मजदूरों के साथ गैरों जैसा बर्ताव कर रहे हैं. जब देश एक है तो क्यों हमारे मजदूर, तुम्हारे मजदूर जैसी बातें हो रही हैं. दिल्ली एक छोटा सा राज्य है. केंद्र सरकार के आधे कंट्रोल में है और कुछ दिन पहले तक तो यहां अधिकारों का टकराव भी होता था. जो राज्य आज प्रवासी मजदूरों को रोकने में नाकाम साबित हो रहे हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि जब आगे हालात ठीक होंगे और ये मजदूर वापस नहीं लौटे, तो हालत क्या होगी. अभी के हालात में दिल्ली से सांसद और विधायक गायब हैं. गौतम गंभीर और मीनाक्षी लेखी को छोड़ दें तो बाकी सांसदों का पता नहीं दिखता. ऐसे ही कुछ हाल विधायकों के भी हैं.

संकट के इस समय में सबसे निराश करता है पीएम मोदी का कुछ न कर पाना. बीते 2 महीनों से मजदूरों की हालत खराब है. ये सही है कि इसके लिए राज्य सरकारें भी दोषी हैं लेकिन केंद्र सरकार क्या कर रही है. केंद्र सरकार की नाक के नीचे से दिल्ली से मजदूर घर भाग रहे हैं लेकिन कोई रणनीति अब तक नहीं दिखी है. पीएम मोदी सीएम के साथ कई बार बैठक कर चुके हैं लेकिन इन बैठकों में आखिर क्या बातचीत होती है, जो आज तक एक रणनीति नहीं बन पा रही है. ऐसा लगता है, जैसे सबके सब बस आंखे मूंदकर बैठें हैं. किसी का कोई कंट्रोल नहीं है. नरेंद्र मोदी को उनकी पार्टी लगातार खुद को एक मजबूत नेता के तौर पर पेश करते आए हैं. जब लॉकडाउन हुआ था, तब लोग पीएम मोदी की बात मानते थे. जनता कर्फ्यू का भी लोगों ने पालन किया था लेकिन फिलहाल हालात उलट हैं. जिनके पास खाने के लिए खाना और रहने के लिए जगह नहीं है, वो लोग भागने को मजबूर हैं. उनके पास विकल्प ही नहीं है पीएम मोदी की बात मानने का. दुर्भाग्य की बात ये है कि ये लोग आज भारत की सड़कों पर बेसहारा हो चुके हैं. भारत एक अनोखी अराजकता से जूझ रहा है और सत्ताधारी दल कान में तेल डालकर बैठे हैं.

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बीते चुनाव को भी एक साल होने वाला है. साल भर पहले ही पीएम मोदी को अकेले जनता 300 सीटें दी थीं. जाहिर सी बात है कि समाज के सभी तबकों के समर्थन के बिना ऐसा संभव नहीं था लेकिन ऐसा लग रहा है कि फिलहाल सरकार गरीब तबके से मुंह मोड़ चुकी है. वक्त बहुत सरकार के पास अन्यथा अगर गरीबों ने सरकार से मुंह मोड़ तो कल बीजेपी के शीर्ष नेता ना तो पार्टी के अंदर मुंह दिखाने लायक रहेंगे और ना ही अंदर.