कल बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का मुख्य उद्देश्य पीएम मोदी को जवाब देना था. दरअसल अलवर रेप कांड के बाद पीएम मोदी ने मायावती पर हमला किया था. उन्होंने ऊना कांड की याद दिलाते हुए कहा था कि क्या मायावती राजस्थान सरकार से समर्थन वापस लेंगी. मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसी मुद्दे पर जवाब दिया और जवाब देते देते वो पीएम मोदी की जशोदा बेन को राजनीति में घसीट ले आईं.

मायावती ने पीएम पर हमला करते हुए कहा, "ये दूसरों की बहन-बेटियों की इज़्ज़त करना क्या जानें, जब ये अपने राजनीतिक स्वार्थ में ख़ुद की बेकसूर पत्नी तक को भी छोड़ चुके हैं." वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसका जवाब भी दिया है लेकिन इस सवाल जवाब की राजनीति से ऊपक उठकर एक बार पीएम की पत्नी जशोदा बेन के बारे में सोचने की जरूरत है. राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप में पीएम की पत्नी को लाना कितना न्यायसंगत है. वो पत्नी जिनका वर्षों से पीएम से कोई नाता नहीं है. पीएम के निजी, सार्वजनिक जीवन में उनका कोई दखल नहीं है. वो आजाद भारत के एक सामान्य नागरिक की तरह हैं. एक महिला लंबे अर्से से सामान्य जीवन जी रही है. जब वो खुद का इस तरह राजनीतिक इस्तेमाल होते देखेगी तो उसे कैसा लगेगा. अगर जशोदाबेन को अपने पति से कोई शिकायत होती तो वर्षों पहले वो इस पर कानूनी कार्रवाई कर चुकी होतीं लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने खुद कभी मीडिया में आकर नाराजगी नहीं जताई.

जशोदाबेन का जिक्र पहली बार नहीं हुआ है. सोशल मीडिया पर पीएम के तमाम आलोचक और तमाम राजनेता ही बार बार उन पर हमला करने के लिए जशोदा बेन का इस्तेमाल करते हैं. बीते दिनों जब तीन तलाक को लेकर पीएम मुखर थे तब भी जशोदा बेन को न्याय दिलाने वालों की संख्या समाज में बहुत थी. ये लोग तीन तलाक के सामने जशोदा बेन को रखना चाह रहे थे. भारत में कथित प्रगतिशील लोगों का एक तबका है. ये बेहद रूचिकर है कि ये तबका महिलावादी होने का दावा करता है. प्राय ये लोग संघ से जुड़े लोगों पर महिलाओं के प्रति खराब सोच रखने का आरोप लगाता है लेकिन बेवजह पीएम की पत्नी को राजनीति में घसीटने पर एक शब्द भी बोलना उचित नहीं समझता. इस तबके को ये नहीं समझ आत कि उसका बयान नरेंद्र मोदी नहीं बल्कि जशोदाबेन और महिलाओं के पक्ष में ही होगा.

जशोदा बेन और नरेंद्र मोदी का रिश्ता निजी है. उनके बीच जो भी विषय है वो भी निजी है उसका पीएम के सार्वजनिक जीवन से कोई लेना देना नहीं है लेकिन उसके बावजूद जशोदा बेन को एक राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश की जाती है. खास बात ये है कि खुलकर पीएम पर निशाना साधने के बावजूद भी लोगों को जशोदा बेन के इस्तेमाल की जरूरत पड़ जाती है. नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने के लिए आपके पास बहुत कुछ है. गुजरात के सीएम के तौर पर 12 साल उसके बाद पीएम के तौर पर 5 साल का कार्यकाल.

मायावती सवाल पूछना ही चाहती थीं तो महिला सुरक्षा से लेकर महिला आरक्षण और तमाम वो मुद्दें हो सकते थे जिन पर पीएम को घेरा जा सकता था लेकिन इसके बावजूद मायावती ने बेहद निजी हमला किया. खासबात ये है कि ये निजी हमला नरेंद्र मोदी के साथ ही जशोदाबेन पर भी है. ये दिखाता है कि जब आप लोगों से कटने लगते हैं तो कहां पहुंच जाते हैं. एक महिला होते हुए मायावती ने भी अपने जीवन में तमाम पुरुषवादी रूढियों का सामना किया होगा. इसके बावजूद होने नरेंद्र मोदी पर हमला करने के लिए जशोदाबेन को बीच में लाकर उन्होंने उसी पुरुषवाद का परिचय दिया है. ये भारतीय समाज के उस पक्ष को भी दर्शाता है जहां महिलाओं को हमेशा पुरुष से जोड़कर ही देखा जाता है. ऐसा लगता है कि एक आजाद व्यक्तित्व के तौर पर महिला की कोई पहचान ही नहीं है. ये देखना बेहद ही चकित भी करता है कि देश की सशक्त महिलाओं में गिनी जाने वाली मायावती भी उसी सोच से प्रभावित हैं और इस स्तर पर पहुंचने के बावजूद वो उस पुरुषवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाई हैं.