जब बात इन दिनो लोकतंत्र बचाने की हो तो आखिर क्यों न पश्चिम बंगाल का नाम याद किया जाए. उसका कारण ये है कि वहां की सीएम इन दिनों देश में लोकतंत्र बचाओ मुहिम की अग्रणी नेता हैं.देश में नेताओं का राजनीति करना समझ में आता है आखिर उनका काम ही राजनीति करना है लेकिन आखिर क्यों पत्रकार, लेखक
खुद को राजनीति के विश्लेषणों में इतना घुसा लेते हैं कि वो खुद राजनेता बन जाते हैं.

पश्चिम बंगाल के बारे में ये बात करना जरूरी है.दरअसल एक तरफ ममता बनर्जी को लोकतंत्र बचाओ मुहिम का अहम झंडाबरदार बताया जाता है तो दूसरी तरफ वहां विपक्षी पार्टियों के लोगों की रोज निर्मम हत्याएं होती हैं. पंचायत चुनाव में बाहुबल का वो खेल खेला जाता है कि विपक्षी पार्टियों के नेता चुनाव में नामांकन तक नहीं करवा पाते हैं. क्या ममता बनर्जी के इसी बंगाल के अंदर इतना सबकुछ होने के बाद आज लोकतंत्र जिंदा है ?

दरअसल पश्चिम बंगाल में के पुरुलिया में और एक और बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या हो गई है.पुरुलिया जिले के डोभाल में दुलाल कुमार नाम के एक बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या हुई है.कल रात पहले उसका अपहरण किया गया और हत्या कर उसके शव को एक टॉवर से लटका दिया गया. बीजेपी के पश्चिम बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने घटना का वीडियो पोस्ट करते हुए इसे सुनियोजित बताया है.हालांकि पुलिस इसे आत्महत्या बता रही है, वीडियो में शव जहां से लटका है वहां से देखकर तो नहीं लगता कि ये आत्महत्या है..

इससे पहले त्रिलोचन महतो नाम के एक बीजेपी के दलित कार्यकर्ता की वहां हत्या हुई थी और उसके शव को पेड़ से लटका दिया गया था. शव के ऊपर बाकयदा संदेश भी लिखा था 'बीजेपी के लिए काम करने वालों का हश्र'.खास बात ये है कि किसी हत्या में दलित शब्द सुनकर तुरंत उछलने वाले लोग इस मामले पर अभी भी चुप्पी साध कर बैठे हैं.
ये दो केस हाल ही के हैं लेकिन इससे 29 मई को कैलाश विजयवर्गीय ने आरोप लगाया था कि झाड़ग्राम जिले में बीजेपी दफ्तर को घेरकर TMC कार्यकर्ताओं ने फायरिंग की.जब झाड़ग्राम जिले के एसपी को फोन किया गया तो उनका फोन बंद था. जब बात DG तक पहुंची तो उन्होंने पुलिस को निर्देश दिया तब जाकर कहीं TMC कार्यकर्ता वहां से भागे और लोगों की जान बच सकी.

पंचायत चुनावों में बंगाल में हु्आ वो तो किसी भी तरह से छुपा नहीं है.टीएमसी कार्यकर्ताओं की गुंडई के कारण चुनावों में विपक्षी पार्टियों के लोग नामांकन तक नहीं कर सके. चुनाव के दौरान हुई हिंसा में 18 लोगों की मौत हो गई.

जो तरीका आज टीएमसी अपना रही है वही तरीका पहले लेफ्ट का था.चूंकि पहले वहां पहले टीएमसी विपक्ष में थी इसलिए निशाना वो थी आज टीएमसी सत्ता में है और बीजेपी का उभार वहां तेजी से हो रहा है तो निशाने पर बीजेपी है.केरल के हालात भी कमोबेश ऐसे ही हैं.आए दिन वहां राजनीतिक हत्याएं होती रहती हैं और अब बंगाल भी उसी राह पर जाता दिख रहा है पर आखिर इस बात से किस को फर्क पड़ता है मोदी को सत्ता में आने से रोकने के लिए लोकतंत्र का बचना भी तो जरुरी है और उसके लिए जो भी साथ आना चाहेगा वो आएगा और बुद्धिजीवियों और पत्रकारों के खास समूह इसी 'ममता-लेफ्ट टाइप ऑफ डेमोक्रेसी' का झंडा बुलंद करते रहेंगे.