महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन हो चुका है. महाविकास अघाड़ी के नाम का नया गठबंधन अब सत्ता में है. जिन तीन पार्टियों ने ये गठबंधन बनाया है उनका इतिहास देखकर कोई भी इसे बेमेल ही कहेगा. फिलहाल इस मेल-बेमेल की कहानी के बीच विधानसभा में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार ने विधानसभा में बहुमत साबित कर दिया. इस बहुमत परीक्षण के दौरान एक और समीकरण देखने को मिला. ये समीकरण महज एक वोट का है लेकिन जिस व्यक्ति का ये एक वोट है वो बड़ा नाम है. दरअसल विधानसभा में राज ठाकरे की एमएनएस ने शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी को वोट नहीं दिया. जबकि लोकसभा चुनाव के पहले से ही राज ठाकरे बीजेपी के खिलाफ मुखर थे और कांग्रेस-NCP के करीब. महाराष्ट्र की सियासत में राज ठाकरे के इस कदम के क्या मायने हो सकते हैं, आज हम इसे समझने की कोशिश करेंगे.

महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना का एनसीपी और खासतौर से कांग्रेस के साथ जाना बड़ा परिवर्तन है. शिवसेना हिंदुत्व और क्षेत्रवाद को उठाने वाली पार्टी रही है जबकि कांग्रेस सेक्युलर होने की बात कर रही है. गठबंधन के बाद जब कॉमन मिनिमम प्रोग्राम का एलान किया गया तो उसमें हिंदुत्व शब्द का जिक्र नहीं था, बजाय इसके गठबंधन के सेक्युलर होने की बात कही गई. इतना ही नहीं उद्धव ठाकरे कैबिनेट की पहली बैठक के बाद जब प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए तो सेक्युलर होने पर पूछे गए सवाल पर भड़क उठे. उनके गठबंधन और कैबिनेट के साथी छगन भुजबल ने उन्हें बचाने की कोशिश और उद्धव खुद बोल उठे कि जो संविधान में लिखा है वही सेक्युलर है. इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि शिवसेना अब अपने प्रमुख एजेंडे हिंदुत्व से पीछे हट रही है. बाला साहब ठाकरे की हिंदुत्व की इस छवि से शिवसेना के पीछे हटने से एक जगह महाराष्ट्र की सियासत में बनी है. वैसे तो बीजेपी को ही पूरे देश में हिंदुत्व का झंडाबरदार कहा जाता है लेकिन महाराष्ट्र में शिवसेना के हटने से एक और पार्टी को मौका मिल सकता है. वो है उद्धव के चचेरे भाई राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस यानि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना. वैसे तो ये पार्टी महाराष्ट्र में हाशिए पर है और अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है लेकिन शिवसेना का कदम राज ठाकरे के लिए संजीवनी बन सकता है.

राज ठाकरे ने बीते लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ प्रचार किया. वो वीडियो दिखाकर प्रचार करते थे. उनका प्रचार अभियान काफी चर्चा का विषय भी बना. हालांकि वो चुनाव नहीं लड़े. जब विधानसभा चुनाव की बारी आई को ऐसी चर्चा हुई कि राज ठाकरे एनसीपी और कांग्रेस के गठबंधन में शामिल होना चाहते हैं. बीती 8 जुलाई को राज ठाकरे ने सोनिया गांधी से मुलाकात भी की. वैसे तो यह मुलाकात ईवीएम के मुद्दे पर बताई गई लेकिन खबरें इस बात की आईं कि इसमें महाराष्ट्र चुनाव के मुद्दे पर बात हुई. हालांकि कांग्रेस ने खत्म होने की कगार पर खड़े राज ठाकरे को गठबंधन में शामिल नहीं किया. ऐसे में एमएनएस ने 288 सीटों वाले महाराष्ट्र में 100 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए और एक सीट पर जीत हासिल की. खास बात यह रही कि पूरे चुनाव में उन्होंने एनसीपी-कांग्रेस को निशाना नहीं बनाया.

वही राज ठाकरे अब शक्ति परीक्षण के वक्त जब शिवसेना 170 विधायक होने का दावा कर रही थी तो गठबंधन को वोट नहीं करते हैं. यह दिखाता है कि वो महाविकास अघाड़ी से दूर जा रहे हैं. महाराष्ट्र में बीजेपी भी अभी अकेले हैं और संभव है कि वो राज ठाकरे की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दे. ऐसे में बीजेपी को वहां हिंदुत्व का एक बड़ा साथी मिल जाएगा और राज ठाकरे की सियासत में नई जान पड़ जाएगी. महाराष्ट्र की उठापटक को देखकर लगता है कि बड़ी बात नहीं जब प्रदेश को फिर से चुनाव की ओर जाना पड़े और अगर ऐसा हुआ तो संभव है कि महाराष्ट्र की सियासत में हिंदुत्व के दो नए जोड़ीदार देखने को मिल जाएं.