आपने किसानों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र का नाम सुना होगा लेकिन छात्रों के आत्महत्या करने के मामले में भी यह राज्य भारत में सबसे आगे है. 2016 से 2018 के बीच 3 सालों में महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 4235 छात्रों ने आत्महत्या की. अगर प्रति साल के हिसाब से देखें तो हर साल महाराष्ट्र में लगभग 1400 छात्रों ने आत्महत्या की है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 से 2018 के बीच देश में कुल 25,542 छात्रों ने आत्महत्या की. आंकड़ों के मुताबिक 2018 में देशभर में सबसे ज्यादा 10 हजार से ज्यादा छात्रों ने आत्महत्या की है. इस तरह देश में आत्महत्या करने वाले हर 7 छात्रों में से एक छात्र महाराष्ट्र का है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आंकड़ों पर आधारित है जो संसद में पेश किए गए हैं. महाराष्ट्र के अलावा पश्चिम बंगाल ही ऐसा राज्य है जहां एक साल में 1 हजार से ज्यादा छात्रों ने आत्महत्या की है. महाराष्ट्र के बाद छात्रों के आत्महत्या करने के मामले में तमिलनाडु और मध्य प्रदेश का नंबर आता है. तमिलनाडु में 2016 से 2018 के बीच 2744 छात्रों ने आत्महत्या की है, जबकि एमपी में तीन सालों के बीच 2658 छात्रों ने आत्महत्या की है.

पिछड़े राज्यों में आने वाले उत्तर प्रदेश में 2016 से 2018 के बीच 1212 छात्रों ने आत्महत्या की है. गुजरात में तीन सालों में 1764 छात्रों ने आत्महत्या की है. राजस्थान के कोटा में छात्रों के आत्महत्या की खबरें काफी सुर्खियों में रहती हैं लेकिन राजस्थान छात्रों के आत्महत्या करने के मामले में शीर्ष 12 राज्यों में शामिल नहीं है. महाराष्ट्र में छात्रों के आत्महत्या करने की संख्या बहुत ज्यादा है. महाराष्ट्र में बीते दिनों सरकार बदल चुकी है और सीएम उद्धव ठाकरे बने हैं. उद्धव ने अपनी कई योजनाओं के बारे में बात की है लेकिन छात्रों की आत्महत्या का मामला उनके एजेंडे में कहीं नहीं नजर आ रहा है. दरअसल इसको लेकर सिर्फ सरकार को जिम्मेदार ठहराना ही ठीक नहीं है, हमारे समाज में डिप्रेशन को कभी गंभीर नहीं माना जाता है. डिप्रेशन को बीमारी के तौर पर लिया ही नहीं जाता. ऐसे में सरकार और समाज दोनों को मिलकर इस समस्या से हर स्तर पर लड़ना चाहिए