जसवंत सिंह और जॉर्ज फर्नांडिस, अटल बिहारी वाजेपई की कैबिनेट के दो बड़े मंत्री और दोनों की राजनीति और जीवन का अंत एक ही तरह से हो गया. जसवंत सिंह, अपने जीवन का आखिरी चुनाव 2014 में निर्दलीय लड़े थे, वजह थी बीजेपी ने उन्हें बाड़मेर से टिकट देने से मना कर दिया था. जसवंत सिंह जिद पर अड़ गए, चुनाव हार गए. जसवंत सिंह बीजेपी के संस्थापक सदस्य थे. ठीक इसी तरह 2009 में पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नॉंडिस को जेडीयू ने टिकट देने से मना कर दिया था. जॉर्ज भी अड़ गए, मुजफ्फरपुर से निर्दलीय ही चुनाव लड़ गए और हार गए. अपने जीवन के अंतिम दिनों में जसवंत सिंह कोमा में थे, उन्हें दुनिया की कोई हाल-खबर नहीं थी, न शायद दुनिया को उनकी कोई हाल-खबर थी. ठीक इसी तरह जॉर्ज भी अल्जाइमर से पीड़ित थे और अंतिम दिनों में उन्हें दुनिया का कुछ नहीं पता नहीं था.

जॉर्ज फर्नांडिस पोखरण और कारगिल के समय देश के ऱक्षा मंत्री थे. इससे पहले वो एक बड़े ट्रेड यूनियन लीडर थे जिन्होंने इंदिरा गांधी तक की नाक में दम कर दिया था. दिसंबर 1999 में जब इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण हुआ, तो यात्रियों की रिहाई के लिए जसवंत सिंह खुद मौलाना अजहर मसूद जैसे आतंकियों को साथ लेकर अफगानिस्तान गए, जिसका काफी मजाक भी बनाया गया. जॉर्ज और जसवंत के बारे में हम ये बातें इसलिए बता रहे हैं, ताकि आपको उनके कद का अंदाजा हो सके. सियासत में इतना बड़ा कद होने के बावजूद दोनों नेताओं को अपने आखिरी समय में पर्याप्त अपमान का सामना करना पड़ा. ये अपमान वो कर रहे थे, जिनको इन्हीं नेताओं ने कभी आगे बढ़ाया था. हालांकि, जीवन के उतार-चढ़ाव का एक समय होता है, आपको शायद दोनों को अच्छी तरह महसूस करना चाहिए. अगर आप चढ़ाव का आनंद ले रहे हैं, तो उतार का स्वागत नहीं तो कम से स्वीकार तो करना ही चाहिए. अटल बिहारी वाजपेयी का कद काफी ऊंचा था, लेकिन अगर वो जबरदस्ती राजनीति में बने रहने की कोशिश करते तो क्या होता? अटल ने सही वक्त पर संन्यास का फैसला लिया और राजनीति से खुद को अलग कर लिया. उन्हीं के साथी लालकृष्ण आडवाणी ने भी थोड़ी देर से ही सही, उस वक्त को पहचान लिया और अपना रास्ता बदल दिया. मार्गदर्शक मंडल में भेजे जाने के बाद वो पूरी तरह शांत हो गए, न पार्टी के अंदर सियासत की और न ही मीडिया में कोई बयानबाजी. जब इन्हीं नेताओं की बात हो रही है, तब अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट के एक और वरिष्ठ मंत्री यशवंत सिन्हा का जिक्र आना स्वाभाविक है. यशवंत सिन्हा अहमियत न मिलने से नाराज हैं, आज वो कश्मीर में 370 की फिर से बहाली की मांग कर रहे हैं. लोगों के लिए समझना मुश्किल है कि ये यशवंत सिन्हा असली हैं या वाजपेयी कैबिनेट वाले असली थे. 2014 की मोदी सरकार में उनके बेटे राज्य मंत्री थे लेकिन आज वो भी कैबिनेट से बाहर हैं. यशवंत सिन्हा के पास न तो कोई वोट बैंक हैं और न ही उम्र. इस उम्र में सम्मान एक बड़ी बात होती है और यशंवत सिन्हा ने अपना कद वक्त के साथ गिरा दिया है.

सम्मान और अपमान की इस बहस में कांग्रेस की तरफ भी देखना जरूरी है. जहां 87 साल के मोतीलाल वोरा अभी तक पार्टी के कोषाध्यक्ष थे. इसके अलावा पार्टी में ओल्ड वर्सेज न्यू की बहस जारी रहती है. कमलनाथ और दिग्विजय के चक्कर में ज्योतिरादित्य सिंधिया पार्टी छोड़ चुके हैं, अशोक गहलोत के चक्कर में पायलट उड़ान भरते-भरते रह गए, असम में हेमंता बिश्वशर्मा, तरूण गोगोई की वजह से आज बीजेपी के बड़े नेता बन चुके हैं. पार्टी की दुर्गति के लिए कई बार पुराने नेताओं की महत्वकांक्षा को दोषी ठहराया जा चुका है. हालांकि, हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा और पंजाब में कैप्टन अमरिंदर ने अपने प्रदर्शन से इस तथ्य को झुठलाने की कोशिश की है.

बीजेपी ने अपने नेताओं के लिए 75 साल की एक उम्र तय कर दी है, हालांकि बीएस येदुरप्पा इस नियम के अपवाद भी हैं. कहीं न कहीं इससे संदेश जाता है कि पार्टी सत्ता के लिए अपने नियम तोड़ भी सकती है. पार्टियों के इस मनमाने लोकतंत्र के बीच सवाल कई हैं जिन पर चर्चा होनी चाहिए. जो शायद सम्मान और अपमान की इस बहस को ही खत्म कर दे. वो सवाल ये है कि क्या राजनीति में रिटायरमेंट की एक उम्र होनी चाहिए? जब नौकरशाहों से लेकर चपरासी तक की रिटायरमेंट की एक उम्र तय हैं तो भला देश को चलाने का दावा करने वाले इससे अछूते क्यों हैं? नरेंद्र मोदी केंद्रीय सत्ता में आने के बाद कई बदलाव हुए, कई तरह के नए नए सवाल पूछे गए लेकिन ये सवाल आज तक किसी ने भी नहीं पूछा. शायद ये उम्र की सीमा तय कर दी गई होती तो जसवंत सिंह और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे नेता उस सम्मान के साथ राजनीति से विदा पाते, जिसके वो हकदार थे.