चंद दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल को लेकर बेहद तल्ख टिप्पणी की, जिसे मीडिया में वो तवज्जो नहीं मिली जो उसे मिलनी चाहिये थी. सुप्रीम कोर्ट ने कस्टम डिपार्टमेंट की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि बंगाल में कुछ बेहद गंभीर चल रहा है, जिसकी तह में जाना जरूरी है.

सुप्रीम कोर्ट की पश्चिम बंगाल को लेकर चिंता अनायास ही नहीं थी. हुआ ये था कि ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी की पत्नी कोलकाता एयरपोर्ट पर दो किलो सोने के साथ पकड़ी गई थी. इस दौरान जब कस्टम अधिकारियों ने उनसे पूछताछ की कोशिश की तो कोलकाता पुलिस ने ना सिर्फ दखल देकर अभिषेक बनर्जी की पत्नी को छुड़ाया बल्कि कस्टम अधिकारियों को धमकी भी दी गई. जो कि सीधे-सीधे संघीय ढांचे पर प्रहार था.

दूसरा मामला देखते हैं. पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के विशेष पर्यवेक्षक अजय वी नायक ने जो कहा, उसे समझिये. उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल की हालत 15 साल पुराने बिहार की तरह है. अब जिसने 15 साल पुराना बिहार देखा है, उससे बेहतर कौन समझ सकता है कि वहां चुनाव कैसे होते थे. बूथों पर आग लगा दी जाती थी, एक आदमी पूरे गांव का वोट डाल देता था, मत पेटी में स्याही डाल दी जाती थी, किसी खास वर्ग के मतदाता को बूथ के आस-पास फटकने भी नहीं दिया जाता था. वोटिंग के दिन अगर 100-200 लोगों की जानें नहीं गईं तो पता ही नहीं चलता था कि चुनाव भी हो रहा है. अगर अजय वी नायक ऐसा कुछ बंगाल में होते देख रहे हैं तो वहां की वर्तमान स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है.

अब सवाल उठता है कि जब पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने केंद्रीय बलों की तैनाती कर रखी है, उसके बाद भी स्थिति सुधर क्यों नहीं रही. वेल, इसका जवाब ये है कि पोलिंग बुथों पर सुरक्षाबलों की तैनाती का निर्णय जिला निर्वाचन अधिकारी का होता है. वही ये तय करता है कि कहां, कितनी संख्या में कौन से फोर्स तैनात किये जायेंगे. जाहिर तौर पर ये दिल्ली से तो तय होगा नहीं. और यही मामला बिगड़ रहा है. असल में ममता बनर्जी ने राज्य के ब्यूरोक्रेसी में या तो डर बिठा दिया है या उनको ये विश्वास हो गया है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को कोई हरा नहीं सकता. और यही उनका डर ममता बनर्जी की मनमानी का कारण बन रहा है. सीधी सी बात है कि कोई भी ब्यूरोक्रेट मुख्यमंत्री के खिलाफ खड़ा होगा नहीं. और ममता बनर्जी इसका फायदा उठाकर चुनाव आयोग को तो आंख दिखा ही रही हैं. संघीय ढ़ांचे का भी तमाशा बना रही हैं.

एक-दो और उदाहरण देखते हैं. सीबीआई का विवाद अभी बहुत पुराना नहीं है. जब ममता बनर्जी ने इसी बंगाल पुलिस से सीबीआई अफसरों को गिरफ्तार करा लिया था. जब वो एक भ्रष्टाचार के आरोपी से पूछताछ करने पहुंची थी. छोड़िये बहुत पुरानी बात. आज का ममता बनर्जी का बयान देखिये. उन्होंने कहा है कि पीएम मोदी उनके प्रधानमंत्री नहीं हैं. इस बयान का क्या मतलब निकालें ? क्या बंगाल देश से बाहर है ? क्या ममता बनर्जी को पता नहीं कि पीएम पूरे देश का होता है मेरा या तुम्हारा नहीं. क्या कल को ममता ये नहीं कह सकती हैं कि भारत उनका देश नहीं ? या बंगाल इस देश का हिस्सा नहीं ?

सोचिये आज जब ममता बनर्जी बंगाल पुलिस से सीबीआई अफसरों को गिरफ्तार करवा रही हैं, कस्टम अधिकारियों को धमकी दिला रही हैं तो क्या ये संभव नहीं है कि कल ममता बनर्जी प्रधानमंत्री को गिरफ्तार करवा लें. हो सकता है अभी ये बात किसी के गले ना उतरे. लेकिन इतिहास ग्वाह है कि जब-जब छोटी-छोटी गलतियों पर ध्यान नहीं दिया गया है, उसने बड़ा नासूर बनकर जख्म दिया है.

तो इसका उपाय क्या है ? देखिये हमारे संविधान निर्माताओं को इस बात का बखूबी अंदाजा था कि क्षेत्रीय क्षत्रप भविष्य में इतने ताकतवर हो सकते हैं कि वे संघीय ढ़ांचे के लिये खतरा बन जाये. इसी बात को ध्यान में रखकर संविधान में अनु्च्छेद 356 और 365 शामिल किये गये हैं, जो राज्यों में राष्ट्रपति शासन से संबंधित हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने भी इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि अगर कोई सरकार जान-बूझकर आंतरिक अशांति को बढ़ावा दे रही है तो राष्ट्रपति संबंधित राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर सकते हैं. फिलहाल जो पश्चिम बंगाल में हो रहा है, उसको देखते हुए ये कहा जा सकता है कि राज्य सरकार ना सिर्फ हिंसा को बढ़ावा दे रही है बल्कि केंद्र सरकार के संवैधानिक निर्देशों की भी पालन नहीं कर रही है. और इन हालातों में वहां राष्ट्रपति शासन लगाना ही एकमात्र विकल्प बचता है.

(ये लेख विवेक सिंह के फेसबुक पेज से लिया गया है, विवेक ZEE Media Corporation में पत्रकार है।)