दोस्तों भारतीय मीडिया एक बार फिर से उत्साह में है.ऐसे उत्साह में की फिर वही चाणक्य और पप्पू वाली वारदात की जा रही है.खैर पप्पू के मामले में हम मीडिया को क्लीनचिट दे चुके हैं लेकिन चाणक्य के लिए तो ये इतिहास उसे कभी माफ नहीं करेगा.दरअसल प्रियंका गांधी को जैसे ही यूपी कांग्रेस का महासचिव बनाया गया मीडिया उत्साह में आ गया.

लिखा जाने लगा की ये कांग्रेस का 'ब्रह्मास्त्र' है.अब जब इतनी बड़ी तुलना हुई ही है तो क्यों न हम ब्रह्मास्त्र के बारे में थोड़ी जानकारी ले लेते हैं.रामायण और महाभारत के ग्रंथों में ब्रह्मास्त्र का उल्लेख का मिलता है.ब्रम्हास्त्र के बारे में कहा गया है की इसके प्रयोग से शत्रु के साथ साथ ब्रम्हांड के भी एक हिस्से का नाश हो सकता था.दो ब्रह्मस्त्रों के टकराने से प्रलय आ सकती थी.महाभारत में अर्जुन और अश्वत्थामा ने ऐसा ही किया था.हालांकि अर्जुन ने ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया था और अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र को परिक्षित की पत्नी के गर्भ पर गिराना पड़ा था.रामायण में भी जब लक्ष्मण ने मेघनाथ पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना चाहा तो भगवान राम ने उन्हे ये कहकर मना कर दिया की इससे पूरी लंका का नाश हो जाएगा.कुल मिलाकर ब्रह्मास्त्र वो मारक अस्त्र था जो इतना विनाशक था की खुद की नाश की नौबत आने पर भी भगवान राम ने उसके प्रयोग की अनुमति नहीं दी.

क्या प्रियंका को राजनीति में उतारना उतना ही भयानक कदम था.इस तुलना के दो मायने लगाए जा सकते हैं.पहला अगर ये वाकई भयानक कदम है तो क्या कांग्रेस ये महसूस करने लगी थी की अब उसका नाश होने वाला है और प्रियंका को राजनीति में उतारना उनका आखिरी विकल्प था.अगर इस पर बात करें तो हाल ही में कांग्रेस ने तीन राज्यों में जीत दर्जकर सरकार बनाई है.राहुल गांधी की छवि उनके जीवन के अब तक के सबसे अच्छे स्तर पर है.कोई प्रियंका के बारे में बात भी नहीं कर रहा था.ऐसे में ये तर्क तो साफ साफ खारिज हो जाता है.

दूसरे तर्क पर आएं तो क्या प्रियंका इतना बड़ा चेहरा हैं की वो विरोधी खेमे का अकेले नाश कर दें.भारत में जहां उन्हें उतारा गया है यानि यूपी में वहां जाति की राजनीति का जोर है.प्रियंका के पास न तो चेहरे के तौर पर जाति है,न वो महिलाओं में उतनी लोकप्रिय हैं और न ही भाषण कला में निपुण हैं.हां संगठन स्तर पर वो क्या करेंगी ये वो और कांग्रेसी कार्यकर्ता समय के साथ ही बताएंगे.उस स्तर पर भी कांग्रेस के पास कई ऐसे नेता हैं जो संगठन के काम में बेहद निपुण हैं.ऐसे में वो कुछ अलग नहीं दिखतीं.हां ये जरूर हो सकता है की कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में गांधी परिवार के एक नए चेहरे को देखकर उत्साह पैदा हो.खासतौर पर तब जब सोनिया गांधी अब कम सक्रिय रहती हैं और इसका फायदा कांग्रेस को शुरूआती दौर में ही मिल सकता है.अगर आगे कोई मजबूत प्लान नहीं होगा तो कांग्रेस को इसका कोई फायदा नहीं होगा.

कुल मिलाकर 'चाणक्य' के बाद भारतीय मीडिया ने 'ब्रह्मास्त्र' का प्रयोग करके एक बार फिर से अपनी संकुचित सोच का परिचय दिया है.ऐसा करके वो एक बार फिर से वो उम्मीदों का वो गुब्बार दर्शकों और पाठकों में भर रहा है जिसका शायद एक वक्त के बाद फूटना तय है.....