चंद्रयान 2 का भारत का मिशन 95 फीसदी ही पूरा हो गया. यान ने चंद्रमा की सतह पर लैंड तो किया लेकिन उससे संपर्क टूट गया. हालांकि इसरो के वैज्ञानिक यान की लोकेशन का पता लगा चुके हैं और हो सकता है कुछ दिनों में यान से संपर्क भी हो जाए. इसी बीच जब भारत का ये मिशन फेल हुआ तो दो तरह के लोगों को बातें बनाने का मौका मिल गया. पहला तो हमारा दुश्मन पाकिस्तान जो इसी जुगत में लगा रहता है और दूसरा भारत का कथित बुद्धिजीवी वर्ग. दोनों की अपनी अपनी समस्याएं हैं. पाकिस्तान तो अपने कर्मों से खुद का बुरा हाल बनाए बैठा ही है लेकिन भारत के कथित बुद्धिजीवी वर्ग पता नहीं किस दंड की आकांक्षा में अजीब हरकतें करता रहता है.

दरअसल चंद्रयान मिशन की सफलता के लिए इसरो प्रमुख के सीवन आँध्र प्रदेश के तिरुमाला में वेंकटेश्वर मंदिर के दर्शन करने पहुंचे. इसके बाद से ही वो कथित पर बुद्धिजीवियों के निशाने पर थे. उन पर अंधविश्वासी होने और पिछड़ेपन जैसे तमाम आरोप लगे. दुर्भाग्य से चंद्रयान चांद की सतह से महज 2 किलोमीटर पीछे रह गया और ये मिशन लगभग फेल हो गया. बस बुद्धिजीवियों को यहीं पर मौका मिल गया और उन्होंने अपनी भड़ास निकालनी चालू कर दी. ये कहा गया कि अगर पूजा करने की बजाय मिशन पर ध्यान दिया गया होता तो ये असफलता नहीं होती. किसी बुद्धिजीवी ने इसके जरिए प्रार्थना की शक्ति पर सवाल उठाए.

जो लोग महज पूजा करने भर से के सीवन पर सवाल उठा रहे हैं वो अपने आप में एक पाखंड कर रहे हैं. उन्होंने सीवन की जिंदगी के पुराने सफर को नजरअंदाज किया है. एक गरीब किसान परिवार में जन्में सीवन ने इसरो के प्रमुख तक का अपना सफर सिर्फ मंदिर में पूजा करके ही तय नहीं किया है. इसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत भी की है. सीवन की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है. उसके बावजूद उनके और इसरो के प्रयासों पर सवाल खड़े करना महज एक मूर्खता है. बात आती है ईश्वर में विश्वास की तो हर एक आस्तिक व्यक्ति पूजा पाठ और ईश्वर में प्रार्थना में यकीन रखता है. प्रार्थना से एक अपने तरह का आत्मविश्वास पैदा होता है. किसी कार्य को करने की ताकत मिलती है. हालांकि ईश्वर में विश्वास रखने वाला और प्रार्थना करने वाला कोई भी व्यक्ति ये कहता नहीं मिलेगा कि आप सिर्फ मंदिर में बैठे मिलें और अपना काम छोड़ दें. इसरो प्रमुख और उनकी टीम सालों से चंद्रयान 2 के मिशन में लगी हुई थी. अगर इस सबके बीच थोड़ा सा वक्त निकालकर मंदिर चले गए तो क्या गलत हो गया.

हम सबने इसरो के प्रमुख सीवन को देखा है. जो अपने आप में एक अहम ओहदा है. हमने उनकी उस गुमनाम जिंदगी को नहीं देखा है जिसमें वो संघर्ष किया करते होंगे. उन दिनों में उन्होंने किस तरह खुद को संभाला और उसमें ईश्वर की प्रार्थना का कितना रोल है, इससे उनको कितनी ताकत मिली ? इस बारे में हम कुछ नहीं जानते. फिर भी इतने बड़े मिशन की असफलता भर से सीवन को निशाने पर ले लेना, उन्हें अंधविश्वासी बताना. ये सब कुंठित जीवन के लक्षण हैं. जो लोग ऐसा कह रहे हैं, उन्हें भी मंदिर जाकर भगवान के सामने थोड़ी देर बैठना चाहिए और यकीनन उन लोगों को इस तरह के पाखंड से मुक्त होने की शक्ति मिलेगी.