पिछले कुछ दिनों से यूपी के हाथरस की एक वारदात लगातार सुर्खियों में है. हाथरस में 19 साल की एक लड़की की रेप के बाद हत्या का आरोप है. सभी 4 आरोपी जेल के अंदर हैं, लेकिन यूपी पुलिस की कार्रवाई की लगातार आलोचना हो रही है. सबसे पहले तो ये समझ के बाहर होता है कि अचानक किसी एक घटना में ऐसा क्या होता है जो वो सुर्खियों में छा जाती है. अखबारों के पन्ने पर रोज ही बच्चियों से लेकर बुजर्गों तक के साथ रेप की खबरें निकलती हैं लेकिन सभी शांत रहते हैं. अचानक से किसी एक खबर के साथ ऐसा क्या होता है जो वो इस कदर मीडिया में छा जाती है? ये सवाल दरअसल पत्रकारिता से जुड़ा अध्ययन करने वाले लोगों के लिए है. 3 साल के पत्रकार और उससे पहले के एक दर्शक या पाठक के तौर पर मुझे इस सवाल का जवाब आज तक नहीं मिला. खैर, इस सवाल को फिलहाल के लिए छोड़ते हैं और जिस केस की चर्चा कम से कम हो रही है, उसकी बात ही कर ली जाए.

हाथरस में ये वारदात 14 सितंबर को होती है. वारदात के तुरंत बाद के पीड़िता के वीडियो के मुताबिक, उसके साथ मारपीट की गई और गला दबाकर मारने की कोशिश की गई. वीडियो के मुताबिक वारदात में एक संदीप नाम का एक आरोपी शामिल था. पीड़िता की मां के मुताबिक, पीड़िता घास लेने गई थी, वहीं संदीप नाम के एक शख्स ने पीड़िता का बुरी तरह से गला दबा दिया जिसके बाद घायल हालत में पीड़िता को अस्पताल लाया गया.

राष्ट्रीय अखबार हिंदुस्तान ने भी हाथरस के अपने संस्करण में वारदात को इसी तरह से लिखा है. पुलिस ने बेहद मामूली धाराओं में केस दर्ज कर लिया. इसके बाद रेप के बारे में भी चर्चा शुरू होती हैं. कुछ न्यूज चैनल और ट्विटर पर पत्रकारों ने इसके बारे में ट्वीट भी किए. पुलिस पर कार्रवाई के लिए दबाव बनता है. परिवार पुलिस पर लापरवाही का आरोप लगाता है और पीड़िता के साथ गैंगरेप होने की बात करता है. कुल 9 दिन बाद मीडिया के तमाम दबाव के बाद गैंगरेप का केस दर्ज किया जाता है. सभी 4 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है.

परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने इलाज में भी लापरवाही बरती है. इसके बाद पीड़िता को इलाज के लिए अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया. यहां भी पीड़िता की हालत गंभीर थी. इसी बीच यहां की मेडिकल रिपोर्ट में रेप की पुष्टि नहीं होती है. इसके बाद पीड़िता को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में ले जा जाया जाता है. जहां 29 सितंबर को पीड़िता की मौत हो जाती है. परिवार का आरोप है कि प्रशासन की निष्क्रियता की वजह से उनकी बेटी की मौत हुई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी रेप की पुष्टि नहीं होती है. हालांकि, पीड़िता का मौत से पहले का एक वीडियो सामने आता है जिसमें वह गैंगरेप और जानलेवा हमले का आरोप लगाती है.

इसके बाद गांजे-अफीम के 'नशे' में डूबी मीडिया की नजर हाथरस पर जाती है और कवरेज शुरू होती है. पुलिस की लापरवाहियों से खराब हो चुके इस केस में, एक औऱ कांड यूपी की सत्ता करती है. स्थानीय पुलिस तो बदनाम होती ही है, लेकिन आधी रात में पीड़िता के शव को बगैर परिजनों की इजाजत के जला देना, अंग्रेजी हुकूमत याद दिलाता है. खुद को मठ का योगी कहने वाले एक शख्स के सीएम रहते ये कैसे संभव हुआ, इसका जवाब तो शायद वो खुद ही बेहतर दे सकें. इसके बाद गांव के आस-पास पुलिस का डेरा, मीडिया के जाने पर रोक, मीडिया के साथ पुलिस की झड़प, परिजनों के धमकाते हाथरस के डीएम के वीडियो जैसे तमाम ऐसे तथ्य सामने आते हैं.

इसी बीच यूपी के एडीजी प्रशांत कुमार एक और फोरेंसिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए रेप की वारदात से इंकार करते हैं. प्रशांत जी और हाथरस के एसपी से पूछना चाहिए कि अगर रेप नहीं था, तो 9 दिन बाद गैंगरेप का केस क्यों दर्ज किया गया. यूपी के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने आज तक पर एडीजी की जानकारी पर सवाल उठाते हुए कहा कि फोरेंसिक रिपोर्ट की गलत व्याख्या कर रहे हैं. विक्रम सिंह ने कहा कि जिन तथ्यों के आधार पर रेप को खारिज किया जा रहा है, वो काफी नहीं हैं.

कल आज तक की रिपोर्टर का फ़ोन कॉल लीक होता है जिसमें वो पीड़िता के भाई के साथ बातचीत कर रही हैं. वो पीड़िता के भाई से सवाल पूछती हैं कि पीड़िता ने पहले वीडियो में रेप की बात क्यों नहीं की? पीड़िता का भाई जवाब देता है कि शायद शर्म की वजह बहन ने उस वक्त न बताया हो. पीड़िता के भाई की बात भी वाजिब है और हमारे समाज में ऐसा होना सामान्य भी है.

इस पूरे घटनाक्रम में एक लड़की अपनी जान गंवा चुकी है. 4 आरोपी जेल के अंदर हैं जिन पर गैंगरेप और हत्या का आरोप है. पुलिस खुद ही गैंगरेप होने से इंकार कर रही है. कुल मिलाकर इस केस का पूरा घटनाक्रम यूपी पुलिस और पूरे प्रशासन की जबरदस्त नाकामी और उन नाकामियों को छिपाने के लिए गलत तरीकों के इस्तेमाल की एक केस स्टडी बन चुका है. पहले तो पुलिस ऐसी वारदातें होने से रोक नहीं पा रही है. इसके बाद वारदात होने पर एक ढंग की जांच भी पुलिस नहीं कर पा रही है और सबसे बुरी बात ये है कि इन सबको छिपाने के लिए पीड़िता के शव का आतंकियों की तरह अंतिम संस्कार किया जा रहा है. इस पूरे केस में वो आरोपी ही आरोपी नहीं हैं बल्कि पुलिस और प्रशासन भी इस पूरे घटनाक्रम के लिए बराबर का जिम्मेदार है.