अगर आप रोड पर हादसे के शिकार लोगों की मदद को लेकर गंभीर रहते हैं तो इस खबर को पढ़कर आप बेशक निराश होने वाले हैं.दरअसल हादसों के शिकार के लोगों की मदद करने वालों की सुरक्षा के लिए कानून बनाए जाने के बाद भी भारत के हालात में सुधार नहीं हुआ है.ब्रिटिश अखबार द गार्जियन में छपे एक सर्वे के मुताबिक आज भी इन मददगार लोगों को पुलिस के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है.

सड़क सुरक्षा के मामले में भारत की हालत बेहद खराब है और 2017 में कुल डेढ़ लाख लोगों ने अपनी जान सड़क हादसों में गंवा दी.अगर हम इन हादसों का औसत निकाले तो भारत में हर 10 मिनट में तीन लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवा देते हैं.सड़क हादसों के लिए इतने खतरनाक देश में अधिकतर पीड़ितों को प्राथमिक चिकित्सा तक नहीं मिल पाती क्योंकि पुलिस उत्पीड़न के डर से सड़क से गुजर रहे राहगीर घायल लोगों की मदद नहीं करते हैं.खास बात ये है की भारत में एंबुलेंस सेवाओं की हालत भी इतनी खराब है की समय पर हादसे की जगह इनका पहुंचना मुश्किल होता है.

2016 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को गुड सेमेटेरियन लॉ बनाने को कहा था जिससे सड़क हादसों मे घायलों की मदद करने वालों को तमाम कानूनी कार्रवाइयों से मुक्ति दिलाई जा सके और घायलों की मदद के लिए लोग हिचकिचाए नहीं.लेकिन एक एनजीओ के सर्वे में इस कानून के बारे में चौकाने वाला खुलासा हुआ है.भारत में अभी भी 84 फीसदी लोगों को अपने इस अधिकार के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

सड़क पर घायल लोगों की मदद करने वाले 230 लोगों के बीच किए गए सर्वे में लोगों में से 59 फीसदी का कहना है की घायलों की मदद के बाद इन्हें पुलिस ने हिरासत में ले लिया और इनसे पूछताछ की गई जबकि 22 फीसदी लोगों का कहना है की वो जिस अस्पताल में वो पीड़ितों को लेकर पहुंचे वहां के अधिकारियों ने उन्हें हिरासत में ले लिया.

इसके बाद भारत के 11 बड़े शहरों के 2800 लोगों के बीच किए गए सर्वे में लोगों की अलग अलग ये राय निकलकर सामने आईं.-

सिर्फ 12 फीसदी लोग ही हादसे के बाद पुलिस बुलाने की हिम्मत रखते हैं।

वहीं 29 फीसदी लोग फोन कर एबुलेंस बुलाना पंसद करते हैं।

72 फीसदी लोग आज भी सड़क पर घायलों को मदद करने से हिचकते हैं।

28 फीसदी लोग ही सड़क पर पड़े घायल को अस्पताल पहुंचाने की हिम्मत रखते हैं।

96 फीसदी पेशेवरों ने माना कि अस्पतालों में नए कानून संबंधी चार्टर चस्पा नहीं हैं।

64 फीसदी पुलिस अधिकारी मानते हैं कि सेमेरिटिन का निजी विवरण लिया जाता है।

आपको बता दें की 2016 में बनाए गए कानून के तहत सड़क हादसों में घायल की मदद का पुलिस जबरदस्ती नाम,पता और मोबाइल नंबर नहीं पूछ सकती.उन्हें थाने आने पर मजबूर नहीं किया जा सकता और ये उनके ऊपर निर्भर करता है.इसी तरह अस्पताल में डॉक्टर उन्हें रोकने के लिए मजबूर नहीं कर सकते.कोर्ट में भी चश्मदीद गवाह के तौर पर उन्हें सिर्फ एक बार बुलाया जा सकता है और इसके लिए उन्हें मजबूर नहीं किया जा सकता है.