पंजाब के किसानों के साथ शुरू हुए आंदोलन का नेतृत्व अब राकेश टिकैत के हाथों में हैं. सभी की नजर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर है और असलियत में यहां से किसान आंदोलन के अलग ही सियासी अहमियत की शुरुआत हो चुकी है. अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश के चुनाव के लिए यह आंदोलन बहुत अहम बन चुका है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश 2014 के बाद या सीधे तौर पर कहें तो मुजफ्फरनगर दंगों के बाद बीजेपी के लिए बहुत ही फायदेमंद रहा है. ऐसे में अगर इस पूरे क्षेत्र में अगर कोई राजनीतिक बदलाव होता है तो उसका सीधा असर विधानसभा और फिर 2024 के लोकसभा चुनावों पर होगा. कुल मिलाकर पंजाब और हरियाणा से शुरू हुए आंदोलन की धुरी अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश है.

किसान आंदोलन के इस बदलते समीकरण की वजह से ही शायद सरकार, 26 जनवरी की हिंसा के बाद भी आंदोलनकारियों पर कार्रवाई नहीं कर पाई और सुरक्षाबलों को आंदोलन की जगह पर जाने के बाद भी वापस आना पड़ा. राकेश टिकैत ने कल अपने एक बयान में कहा कि यह आंदोलन अक्टूबर से पहले खत्म नहीं होगा और तब तक बातचीत भी चलती रहेगी. राकेश टिकैत सरकार से सभी किसान कानून वापस लेने की मांग कर रहे हैं, जबकि उन्हें पता है कि सरकार ऐसा नहीं करेगी. शायद इसीलिए वो जानते हैं कि आंदोलन को लंबा चलाया जा सकता है. चुनावों और तमाम दबाव को देखते हुए सरकार चाहेगी कि यह आंदोलन जल्द से जल्द खत्म हो.

26 जनवरी की हिंसा के बाद, भाकियू के अध्यक्ष नरेश टिकैत वापस मुजफ्फरनगर चले गए थे और उन्होंने धरने के खत्म होने का ऐलान भी कर दिया. इधर गाजीपुर बॉर्डर पर राकेश टिकैत रो दिए और एक नई सनसनी पैदा हुई. जिसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश से हजारों किसान दिल्ली आ गए और दूसरी तरफ मुजफ्फरनगर में नरेश टिकैत ने एक महापंचायत करके औपचारिक रूप से धरने को चालू रखने का ऐलान कर दिया.

राकेश टिकैत , महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे हैं जिन्हें बड़ा किसान नेता माना जाता है. व्यक्तिगत रूप से राकेश टिकैत की बात करें वो दो बार चुनाव लड़ चुके हैं. एक बार 2007 का विधानसभा चुनाव जब वो निर्दलीय लड़े और चुनाव हारे. इसके बाद, 2014 के लोकसभा चुनाव में वो रालोद के टिकट पर अमरोहा से चुनाव लड़े और बुरी तरह हारे. कुल मिलाकर राजनीतिक तौर पर टिकैत का इतिहास बहुत मजबूत नहीं रहा है. हालांकि, परिस्थितियां बदलती हैं और उस हिसाब से समर्थन और विरोध भी बदलता है. किसी को पता नहीं था कि चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह को अपने गढ़ मुजफ्फरनगर में संजीव बालियान से हार का सामना करना पड़ेगा, लेकिन आज के हालात में वही बालियान कहीं नजर नहीं आ रहे हैं.

किसान आंदोलन के भविष्य अब राकेश टिकैत के अपने क्षेत्र में समर्थन पर तय करेगा. टिकैत के आंसुओं से कुछ घंटों में इकट्ठा हुई भीड़ कितने दिनों तक उनके साथ टिकी रह पाएगी और वो कितने दिनों में अपने क्षेत्र में समर्थन बनाए रख पाएंगे. अगर राकेश टिकैत अपने क्षेत्र में मजबूत ही रहे तो बेशक आंदोलन लंबा चलेगा और बड़ी बात नहीं कि सरकार बिल से थोड़ा पीछे भी हटे. अगर राकेश टिकैत का समर्थन कमजोर पड़ता को यह आंदोलन भी लंबा टिक नहीं पाएगा. कुल मिलाकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी की अग्निपरीक्षा है, अगर यहां ढीली पड़ी तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश और किसान बिल दोनों हाथ से चले जाएंगे.