मशहूर पाकिस्तानी शायर फैज़ अहमद फैज़ आजकल भारतीय मीडिया में छाये हुए है। फैज़ वैसे हमेशा से भारत में काफी मशहूर रहे है। अकसर कई फिल्मों में उनकी शायरी सुनने को मिल जाती है या यूनिवर्सिटीज में कला संकाय के छात्र उनकी शेर-ओ-शायरी सुनते या सुनाते मिल जाते है।

इसबार फैज़ को लेकर बवाल मचा हुआ है। उनकी कुछ शायरी को हिन्दू विरोधी बताया गया है। देश में नये पास हुए नागरिकता कानून को लेकर विरोध करने वाले आईआईटी कानपुर के कुछ छात्रों ने फैज़ की कुछ नज्म का इस्तेमाल किया। उसके बाद बवाल अधिक बढ़ने पर आईआईटी कानपुर ने एक कमेटी का गठन कर दिया जो यह पता लगाएगी की इस्तेमाल की गयी नज़्म हिन्दू विरोधी है या नहीं है। फैज़ को लेकर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई का एक किस्सा काफी मशहूर है।

विदेश मंत्री अटल बिहारी बाजपेई पाकिस्तान के आधिकारिक दौरे पर थे। प्रोटोकॉल तोड़ कर फ़ैज़ से मिलने उनके घर गए। सब चकित। दोनों दो तरह से सोचने वाले ।फ़ैज़ भी चकित।मिलने पर वाजपेईजी ने कहा - मैं सिर्फ एक शेर के लिए आप से मिलने आया हूं।और शेर पढ़ा -

मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले ।।

कहते हैं कि यह सुनकर फ़ैज़ भावुक हो गए थे। सनद रहे कि फ़ैज़ ने अपने जीवन के बहुतेरे वर्ष पाकिस्तान की जेलों में बिताया था। संदर्भित ग़ज़ल भी फ़ैज़ ने मांटगुमरी जेल में रहते हुए लिखी थी। पाकिस्तानी हुक्मरानों को फ़ैज़ कभी फूटी आंख न सुहाए। यह अलग बात है कि भारत हो या पाक दोनों जगह अवाम के महबूब शायर। जब ऐसी के दशक में फ़ैज़ भारत आए । कई शहरों में उनका काव्यपाठ आयोजित हुआ। एक पथ के दौरान उनसे उनकी प्रसिद्ध नज़्म रकीब से पढ़ने के लिए कहा गया।फ़ैज़ वह नज़्म बस आधी ही सुनाई। यह पूछने पर कि आधी ही क्यों सुनाई फ़ैज़ ने कहा कि जहां तक सुनाया वहीं तक असली नज़्म है। बाद का हिस्सा अति प्रगतिशीलता के आग्रह में लिखा गया था। वाजपेई ने ऐसे फ़ैज़ को न केवल भारत आने का बल्कि भारत में रहने का भी न्योता दिया था।

पूरी ग़ज़ल इस तरह है

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

कभी तो सुब्ह तिरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-बार चले

बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आएँगे ग़म-गुसार चले

जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ
हमारे अश्क तिरी आक़िबत सँवार चले

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब
गिरह में ले के गरेबाँ का तार तार चले

मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले ।

(लेख का कुछ हिस्सा सदानंद शशि के फेसबुक पेज से लिया गया है)