2004 में आज ही के दिन फेसबुक की शुरुआत हुई थी. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के छात्र मार्क जुकरबर्ग ने अपने दोस्तों के साथ इस वेबसाइट की शुरुआत की थी. इसकी शुरुआत के इतिहास में ज्यादा जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि इसके वर्तमान ने देश-दुनिया में तमाम बदलाव ला दिए हैं. वो बदलाव जिन्होंने राजनीति भी बदली है, जिन्होंने लोगों को भी बदला है. फेसबुक के जन्मदिन के मौके पर आज हम बात करेंगे फेसबुक और समाज के बारे में. फेसबुक ने समाज को कितना बदला है और यह बदलाव सकारात्मक है या नकारात्मक.

लोगों को अभिव्यक्ति के लिए प्लेटफॉर्म मिला-

फेसबुक का एक बड़ा फायदा यह है कि इसने हर किसी को बोलने का मौका दिया है. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय रखने का मौका दिया है. आज जब हम फेसबुक पर कुछ लिख रहे होते हैं या वीडियो डाल रहे होते हैं तो जानते हैं कि इसे पढ़ने, देखने वाले तमाम लोग हैं. लोग लिखते हैं, उस पर दूसरा कमेंट करता है और इस तरह से एक विमर्श की शुरुआत भी होती है. हम एक वक्ता की भूमिका में होते हैं जो एक संदेश दे रहा है और उसे सुनने, समझने वाले तमाम लोग हैं. आमतौर पर पहले बोलने का यह मौका बड़ा ही सीमित था. आपस में लोग बैठकर चर्चा किया करते थे. उस चर्चा में लोगों की एक सीमा थी. बहुत ज्यादा हुए 8-10 लोग हो गए लेकिन सोशल मीडिया पर यह संख्या कहीं ज्यादा होती है. आमतौर पर बड़े नेता या इसी तरह के लोग पहले अपनी बात खुलकर ज्यादा लोगों के बीच पहुंचा पाते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है. फेसबुक ने मंच दिया है और हर कोई अपनी बात कह रहा है.

अभिव्यक्ति के लिए मिले प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग भी हुआ-

लोगों को अभिव्यक्ति के लिए प्लेटफॉर्म तो मिला है लेकिन उसका दुरुपयोग भी बहुत हो रहा है. फेसबुक पर तमाम गलत जानकारियां फैली हुई हैं, क्योंकि यहां सेंसरशिप नहीं है. लोग तमाम जहरीला कंटेंट फैला रहे हैं. तमाम वीभत्स तस्वीरें और वीडियो फेसबुक पर फैले रहते हैं जिनसे दंगे भी भड़काए जाते हैं. फेसबुक पर सबसे ज्यादा इस तरह का कंटेंट फैला रहता है जो हानिकारक है. लोग हिंदू-मुस्लिम से लेकर तमाम बुरी बहस करते हैं. जिनसे समाज में सिर्फ घृणा फैलती है. लोगों को बोलने का मौका मिला है तो उन्होंने उसका दुरुपयोग किया. खास बात ये है कि नकारात्मकता ने ज्यादा असर दिखाया है और ज्यादा तेजी से फैली है. ऐसे में फेसबुक नुकसानदायक ही साबित हुआ है.

सज्जनता की आड़ में सफेदपोशी का बढ़ना-

सफेदपोश शब्द आमतौर पर नेताओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इसका कारण है कि वो जनता के सामने कुछ बोलते हैं और पीछे जाकर कुछ और करते हैं. फेसबुक ने इस सफेदपोशी को बढ़ावा दिया है. यहां हर कोई बहुत ही सभ्य है, ईमानदार है. चाहें उसने अपने वास्तविक जीवन में कितने ही पाप क्यों न किए हों. यहां महिला को लेकर चिंता जताने वाले बहुत से लोग हैं. मां-बाप को लेकर भावुक बातें लिखने वाले लोग हैं, लेकिन असल में इनमें से तमाम अपने वास्तविक जीवन में इससे एकदम अलग होते हैं. फेसबुक से इस सबको बढ़ावा ही मिला है. बीते दिनों सोशल मीडिया पर एक मीटू कैंपेन चला. इसमें लड़कियों ने यौन शोषण से जुड़ी अपने बारे में घटनाओं के बारे में बताया. इन घटनाओं में वो तमाम लोग शामिल थे जो फेसबुक और समाज में बड़ी अच्छाई के साथ पेश आते हैं. हालांकि फेसबुक की वजह से ही इनका चेहरा भी सामने आया. ये भी फेसबुक की ही खासियत थी.

लोगों का दुनिया से जुड़ जाना-

फेसबुक के जरिए हम देश विदेश के तमाम लोगों से जुड़ पाते हैं. उनकी बातों को जान पाते हैं और उनसे अपनी बात कह पाते हैं.अपने विचारों में समानता की वजह से हम दूर वालों के भी पास आ जाते हैं. तमाम हमारे दोस्त जो दूर रहते हैं, उनसे फेसबुक के सहारे ही सही हम बातचीत कर पाते हैं. आप घर में अकेले बैठे हों फिर भी फेसबुक के सहारे जान सकते हैं कि बाहर समाज में क्या हो रहा है. पूरे समाज का एक चलचित्र आपके सामने रहता है. कुल मिलाकर लोगों को जोड़ने और दूरियां कम करने में फेसबुक बड़ा ही मददगार साबित हुआ है.

अपने आसपास के लोगों से कट जाना-

जहां दूर बैठे लोगों को फेसबुक ने पास लाया है तो वहीं पास वालों को दूर भी किया है. आजकल लोग सोशल मीडिया पर इतना ज्यादा एक्टिव रहते हैं कि अपने घर और आस पड़ोस के समाज से बात ही नहीं करते. खाने की वक्त जब सभी घर वालों को साथ बैठकर खाना चाहिए, बातचीत करनी चाहिए. उस वक्त में भी लोग फोन का इस्तेमाल करने लगते हैं. ऐसे में फेसबुक ने दूर बैठे लोगों को पास लाया है तो पास वालों को दूर भी किया है.

तमाम घटनाओं और प्रयोगों की तरह फेसबुक के भी दो पहलु हैं. अच्छा और बुरा. दरअसल हमारे समाज की हर एक कड़ी के ही दो पहलु हैं. और फेसबुक भी अब समाज का अहम हिस्सा बन चुका है. ऐसे में फेसबुक भी अच्छाई और बुराई दोनों हैं. कहा जाता है कि बुराई, अच्छाई के मुकाबाले ज्यादा तेजी से फैलती है. ऐसे में फेसबुक भी इससे अछूता नहीं है. आज इसकी अच्छाई पर बुराईयां हावी होती जा रही हैं और उन्हें ठीक करने की जिम्मेदारी फेसबुक और समाज की है. पर जैसा कि हमेशा होता है फिलहाल ऐसा कोई सुधार होता नहीं दिख रहा