लोकसभा चुनाव में असम से बीजेपी का काफी उम्मीदे हैं. यहां उनकी सरकार भी है. हेमंता विश्वशर्मा के तौर पर मजबूत रणनीतिकार भी है. असम ही वो राज्य है जो बीजेपी के लिए पूर्वोत्तर का दरवाजा साबित हुआ है. बीजेपी खुद भी असम में अच्छी सीटें जीतने का दावा कर रही है. इसी बीच एक सीट असम में ऐसी भी जहां से आज तक एक भी हिंदू उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत पाया है. खास बात ये है कि बीजेपी ने इस चुनाव में इस सीट को अपनी गठबंधन की साथी असम गण परिषद को दिया है. ये लोकसभा सीट है असम की धुबरी. एक तथ्य ये भी है कि बीजेपी की सहयोगी अगप ने भी यहां से मुस्लिम उम्मीदवार को ही उतारा है.

धुबरी के बारे में विस्तार से बात करें तो इस सीट पर AIUDF के मौलाना बदरुद्दीन अजमल का कब्जा है. उन पर ये आरोप लगता है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों के वोट बनवाकर वो चुनाव में जीत दर्ज करते हैं. बदरुद्दीन अजमल कोलकाता की उस बड़ी रैली का हिस्सा थे जिसे ममता बनर्जी ने बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन की रैली के तौर पर आयोजित किया था.धुबरी सीट एक जमाने में कांग्रेस का गढ़ हुआ करती थी. 1971 से 2004 के बीच कांग्रेस ने यहां 9 बार जीत दर्ज की. 2009 में यहां से मौलाना बदरुद्दीन ने पहली बार जीत हासिल की. उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार को ही चुनाव में शिकस्त दी थी. 2014 में भी उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार वाजिद अली को 2 लाख से ज्यादा के मतों के अंतर से हराया था. इस चुनाव में बीजेपी के उम्मीदवार देबोमय सन्याल तीसरे नंबर पर रहे और उन्हें 2 लाख से ज्यादा वोट हासिल हुए.

देश में 15 लोकसभा सीटें हैं जहां पर मुस्लिम मतदाता 50 फीसदी से ज्यादा हैं.धुबरी में इनमें से एक है. 65 फीसदी मुस्लिम वोटों वाली इस संसदीय सीट पर अजमल का मुकाबला कांग्रेस के अबु ताहिर बेपारी, असम गण परिषद के जावेद इस्लाम और तृणमूल कांग्रेस के नुरुल इस्लाम चौधरी से है. बीते चुनाव में यहां 88 फीसदी से ज्यादा वोटिंग हुई थी. बीजेपी चाहेगी कि इस बार भी यहां बंपर वोटिंग हो और मुस्लिम वोटरों के बंटवारे के बीच बाकी वोटरों को साथ लाकर चुनाव जीता जा सके. अपने प्रति मुस्लिम वोटरों की उदासीनता को देखते हुए बीजेपी ने यहां साथी पार्टी को मुस्लिम उम्मीदवार के साथ उतारा है. बीते चुनाव में जिस तरह से बीजेपी के उम्मीदवार को वोट मिले उसे देखते हुए बीजेपी को इस बार धुबरी से काफी उम्मीदें होंगी.

धुबरी वो सीट है जहां पर आज तक हिंदू उम्मीदवार ने जीत दर्ज नहीं की. 1998 में बीजेपी के पन्नालाल ओसवाल ने यहां 24 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल किए. हालांकि 1999 में उनकी उल्फा उग्रवादियों ने हत्या कर दी. आपको बता दें कि धुबरी में 3 लाख से ज्यादा हिंदू बंगाली मतदाता हैं जो बीजेपी के साथ जा सकते हैं. दरअसल इन मतदाताओं को सिटिजेन अमेंडमेंट बिल से बड़ी उम्मीदें हैं. अगर ये बिल पास हुआ तो तमाम बांग्लादेशी हिंदूओं को भारत की नागरिकता मिल जाएगी.

इकॉनोमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक असम सरकार ने किसानों को साल में 6 हजार रूपये देने की योजना को बेहतर तरीके से लागू किया है. इससे बड़ी संख्या में मुस्लिम किसानों को भी फायदा पहुंचा है. हालांकि इसी अखबार की रिपोर्ट ये भी कहती है कि अधिकतर मुस्लिम अभी भी बीजेपी को वोट नहीं देना चाहते हैं. विकास योजनाओं से लेकर सिटिजन अमेंडमेंट बिल के जरिए बीजेपी ने भले ही असम में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की हो लेकिन धुबरी में जीत दर्ज करना उनके लिए इस बार भी आसान नहीं होने वाला है..