दिल्ली में हुई हिंसा में अब तक 35 लोग मारे जाने की पुष्टि हुई है और सैकड़ो लोग घायल हुए है। पुलिस और अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी में माहौल में तनाव पर शांति है। हालांकि बुधवार रात भी आगजनी की कुछ छुटपुट घटनाएं हुई।

तनावपूर्ण शांति के बीच नालों से लाशों का निकलना जारी है आज भी गगनपुरी इलाके से नाले से दो लाशें बरामद की गयी। इस बीच राजनीतिक दलों का आपसी सिर फुट्टौवल शुरू हो गया है। सभी दल दंगे के लिए एक दूसरे को दोषी साबित करने में लग गए है। आम आदमी पार्टी के निगम पार्षद ताहिर हुसैन पर 3 लोगों की हत्या का आरोप लगा है। मरने वालों में 26 वर्षीय अंकित शर्मा नाम के इंटेलिजेंस ब्यूरो अधिकारी का नाम भी शामिल है। जिनकी लाश ताहिर हुसैन के घर के पास नाले से बेहद ही ख़राब हालत में बरामद हुई।

आम आदमी पार्टी ताहिर हुसैन का बचाव करने में लगी हुई है हालांकि कई मीडिया कवरेज में ताहिर हुसैन के घर की छत पर पेट्रोल बम का जखीरा और पत्थर के ढेर दिखाई दिए। मीडिया के कुछ सेक्शन ने कपिल मिश्र को ही पूरे दंगे का जिम्मेदार बता दिया। हालांकि सोचने वाली बात ये है की जो व्यक्ति हाल ही में हुए चुनाव में अपनी विधायकी की सीट न जीत पाया हो वो इतना बड़ा नेता हो सकता है की इतने व्यापक पैमाने पर हिंसा फैला दे।

कई मीडिया रिपोर्ट में इस तरह से दिखाया जा रहा है की दंगे में सिर्फ मुस्लिम समुदाय का ही नुकसान हुआ है। दंगो की सच्चाई ये है की हिन्दू हो या मुस्लिम जो जिस इलाके में संख्या में ज्यादा था वंहा उसने दूसरे समुदाय की जान और माल दोनों का नुकसान किया है। दंगे के बाद ज्यादातर लोग यही कहते है की " हम सब तो मिल कर रहते है बाहर से लोग आ गए थे उन्होंने ये कर दिया" कौन है ये बाहर के लोग? दंगा होने के समय आ जाते है और दंगा ख़त्म होते ही गायब हो जाते है। सभी एक दूसरे के धार्मिक स्थलों की रक्षा भी कर रहे होते है फिर भी कंही मस्जिद टूट जाती है तो कंही मंदिर जला दिया जाता है।

दंगो में कई तरह की चूक सरकार और पुलिस प्रशासन से हुई है। पहली चूक नागरिकता कानून के विरोध में चल रहे शाहीन बाग़ के तमाशे को हद से ज्यादा लम्बा खींचना। बीजेपी ने चुनावी फायदा लेने के लिए इस तमाशे को होने दिया। लोकतंत्र में किसी को भी विरोध करने का हक़ है पर आप दूसरे की आज़ादी में खलल नहीं डाल सकते। रास्ते रोके जाने से लोगों के मन में गुस्सा और नफरत दोनों ही पैदा हुए। अगर आप विरोध प्रदर्शन करना चाहते थे तो आप रामलीला मैदान में जाये और आराम से बिरियानी खाये और धरने पर बैठे। पर जब सरकार की तरफ से रास्ते खाली नहीं कराये गए तो लोगों की हिम्मत बढ़ी की कंही भी रास्ता बंद करके बैठ जाये कोई कुछ कहने सुनने वाला तो है नहीं। अगर शाहीन बाग़ का मसला पहले ही हल कर लिया गया होता तो इस तरह की नौबत शायद ही आती।

दूसरी गलती पुलिस प्रशासन की दंगा नियंत्रण में लापरवाही। दंगा प्रभावित इलाके में सुरक्षा बलों की कमी का होना। जिससे दंगाइयों को हिंसा करने का पूरा मौका मिला और आम जनता का काफी नुकसान हुआ। पहले ही दिन हुई हिंसा के बाद तब जबकि पूरे इलाके की जनसांख्यिकी से आप वाकिफ हो उसके बाद भी पर्याप्त सुरक्षा बलों को इलाके में भेजने में देरी करना, माहौल को बिगड़ने देने जैसे है।