मध्यप्रदेश में पिछले कई दिनों से चल रही उठापटक का अंत होते अभी नहीं दिख रहा। हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे और साथ ही उनके समर्थक 20 विधायकों के इस्तीफे से ये जरूर साफ़ हो गया है की मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार जिसे कमलनाथ चला रहे है, संकट से घिर चुकी है और ज्यादातर लोग यही उम्मीद कर रहे है की सरकार का बचना मुश्किल ही है।

ज्योतिरादित्य के कांग्रेस से इस्तीफे के बाद कमलनाथ ने सभी मंत्रियों का इस्तीफा ले कर शायद ये सन्देश देने की कोशिश जरूर की है की नाराज चल रहे विधायकों को वो नए मंत्रिमंडल में जगह दे देंगे। पर शायद ये कदम नाकाफी ही मालूम होता है क्यों की इस्तीफा देने वाले विधायकों में पहले से ही 6 मंत्री पद पर थे।

ज्योतिरादित्य के इस्तीफे बाद कांग्रेस ने उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त बता कर कांग्रेस से निष्कासित करने का ड्रामा भी कर दिया। हालांकि उससे पहले ही सिंधिया अपना इस्तीफा ट्विटर पर अपने अकाउंट से शेयर कर चुके थे। पंद्रह साल बाद बीजेपी से मामूली बढ़त बना कर कांग्रेस ने सत्ता पर जोर जुगाड़ से कब्ज़ा किया था और पंद्रह महीने भी सरकार नहीं चला पाए।

कांग्रेस के कई नेता इसका ठीकरा मोदी और अमित शाह पर फोड़ रहे है की उन्होंने उनकी सरकार को संकट में डाला है पर असलियत उससे कोसों दूर है। इस बार लड्डू बीजेपी की झोली में कांग्रेस की अपने ही नेताओं के प्रति कुनीतियों से आ गिरा है।

दरअसल कांग्रेस पार्टी का मौजूदा स्ट्रक्चर ही उसकी समस्या है। पार्टी अध्यक्ष कभी राहुल गाँधी तो कभी सोनिया गाँधी बन जाती है। राहुल गाँधी ने युवा नेता होने के टैग के अलावा कभी भी कोई ऐसी क्षमता का प्रदर्शन नहीं किया जिससे जनता को ये विश्वास हो पाता की वाकई वो एक कुशल नेता है। राहुल गाँधी की छवि आम जनता में एक ढीले ढाले नेता की है जो अकसर हार के बाद या तो घूमने चला जाता है या इटली की सैर पर निकल जाता है। लोकसभा में कभी भी विपक्ष का नेता बन सत्ता पक्ष से सीधे टक्कर लेते हुए दिखना शायद उन्हें पसंद नहीं है। लोक सभा में दूसरे नंबर की सीट पर अपने ही 2-4 ख़ास लोग (चाटुकार शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहता पर शायद वही सही है) के बीच में दुबक के बैठ कर आप मोदी और शाह जैसे आक्रामक नेताओं का मुकाबला नहीं कर सकते।

मौजूदा कांग्रेस पार्टी में गाँधी परिवार के चाटुकार बुजुर्ग नेता ही मुख्य रूप से संगठन में पकड़ बनाये हुए है। कई नेता जो उम्र के आखिरी पड़ाव पर है वो भी संगठन में पद का मोह नहीं छोड़ पा रहे है। जबकि पार्टी उस दौर में है जब उनका मुकाबला मोदी शाह की उस जोड़ी से है जिसने आक्रामक तरीके से चुनाव लड़ने और पार्टी में संगठन स्तर पर युवाओं को खूब जोड़ा है।

कांग्रेस को बीजेपी से सीख लेनी चाहिए की कैसे उसने उम्र दराज हो चुके लाल कृष्ण अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्रा और लाल जी टंडन जैसे बड़े नेताओं को सक्रीय राजनीति से ससम्मान अलविदा कराया। जिस समय पार्टी को युवा नेताओं को आगे बढ़ाना चाहिए उस समय कांग्रेस पार्टी ने एक बड़े प्रदेश के ताकतवर नेता को सिर्फ कुछ दूसरे चाटुकार नेताओं की वजह से जाने दिया।

अगर कांग्रेस वाकई भारतीय राजनीति में अपनी कोई हैसियत बनाये रखना चाहती है तो अब कांग्रेस पार्टी को गाँधी परिवार से अलग कोई नेतृत्व चुनना पड़ेगा और साथ ही मौजूदा संगठन इकाई को भंग कर नए युवा नेताओं को संगठन में मजबूत पद देने होंगे अन्यथा आने वाले कुछ समय में कांग्रेस पार्टी भारतीय राजनीति में एक महत्वहीन पार्टी बन कर रह जाएगी।