बीते दिनों नई दिल्ली में एक सवाल लगातार पूछा गया, 'अमित शाह कैसे हैं? पिछले तीन महीनों में ये सवाल राजधानी में सैकड़ों लोगों ने पूछा. कई वरिष्ठ पत्रकारों ने अमित शाह का हाल-चाल लेने के लिए उनके घर, ऑफिस और करीबी लोगों को फोन किया. शाह के तमाम राजनीतिक प्रतिद्वंदी भी उनकी तबीयत पर लगातार नजर बनाए हुए थे. 17 सितंबर को शाह के स्वास्थ्य से जुड़ी अफवाहें, इस कदर फैल गईं कि लंदन के एक ब्राडकास्टर ने अमित शाह के लिए शोक संदेश के लिए दिल्ली के रिपोर्टर से जानकारी मांगी. मुंबई के एक टैबलायड ने भी दिल्ली में किसी को ज़रूरत पड़ने पर शाह के लिए शोक संदेश तैयार रखने को कहा. शाह के बारे में ऐसी उत्सुकता कोई नहीं है. दरअसल शाह, सुरक्षा के मुद्दे पर सरकार के पक्ष और विपक्ष में बनने वाली हर राय का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं. सरकार में अमित शाह ऐसी भूमिका में ही रहते हैं कि वो अपने आलोचकों से बच नहीं सकते.

अमित शाह लगातार अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों और सेकुलर-लिबरल लॉबी के निशाने पर रहते हैं. आज भारतीय राजनीति में अमित शाह जिस भूमिका में हैं उसने ही उनकी बीमारी को एक बड़ी खबर बना दिया. अमित शाह ने खुद ट्वीट करके बताया कि वो ठीक हैं लेकिन फिर भी कोई फायदा नहीं हुआ. दरअसल अमित शाह के बीमार होने पर लगने वाले ये कयास उनकी अहमियत के बारे में बताते हैं.

अमित शाह का इलाज करने वाले डॉक्टर उनसे भी ज्यादा सतर्क थे. अमित शाह के बीमार होने पर सवाल यूं ही नहीं खड़े हुए, दरअसल बीते दिनों अमित शाह के कैंसर, डेंगू, मलेरिया और टीबी जैसे टेस्ट हुए. यही वजह है कि उनके बारे में अफवाहें बहुत तेजी से फैलीं.

गुजरात के एक ज्योतिषि के मुताबिक, उन्हें अमित शाह को लेकर कई फोन आए. उन्होंने सभी को जवाब दिया कि अमित शाह का जीवन बहुत लंबा है. खास बात ये है कि अमित शाह लॉकडाउन के बाद से लगातार डटकर काम कर रहे हैं. उनके ऑफिस के तमाम अफसरों ने अधिकतर दिन दो शिफ्टों में काम किया. अमित शाह अपने कैबिनेट के साथियों से अक्सर कहते हैं, 'हम यहां सरकार चलाने नहीं, देश बदलने आए हैं.' जब अमित शाह को कोरोना हुआ और वो भर्ती कराए गए तो भी उन्होंने इस बारे में ट्वीट किया. अमित शाह को डायबिटीज और उन्होंने कभी भी इसे छिपाया नहीं.

अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान भी अमित शाह लगातार काम करते रहे. जम्मू कश्मीर और नॉर्थ ईस्ट को लेकर लगातार वो फोन पर वर्चुअल मीटिंग करते रहे. जब शाह की तबीयत को लेकर कयास लगाए जा रहे थे तब वो गुजराती लेखक अश्वनी भट्ट का उपन्यास 'आश्का मंडल' और उनकी बाकी किताबें पढ़ रहे थे. एम्स में भर्ती होने के दौरान ही उन्होंने नारद संहिता का अनुवाद करना चालू किया. नारद संहिता में नारद मुनि और युधिष्ठिर के बीच बेहतर गवर्नेंस, सुरक्षा और कूटनीति पर दिलचस्प बातचीत है. अमित शाह इसका हिंदी और गुजराती अनुवाद करके प्रकाशित करना चाहते हैं. नारद संहिंता का अनुवाद करना बताता है कि शाह कई भाषाओं के साथ संस्कृत के भी अच्छे जानकार हैं.

अमित शाह को उनके तमाम कड़े राजनीतिक फैसलों के लिए जाना जाता है. विपक्षी उन पर बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि शाह को संगीत, इतिहास और किताबों में खासी दिलचस्पी है. उनकी मां 'कुसुम बा' गांधावादी हैं और उनकी वजह से ही शाह को पढ़ने में दिलचस्पी है. संघ परिवार से ताल्लुक रखने वाले शाह अपनी मां के सम्मान के लिए सिर्फ खादी के कपड़े पहनते हैं.

दिल्ली दंगों की चार्जशाटी और भीमा कोरोगांव हिंसा की जांच की विवादित जांच के पीछे तमाम आलोचकर अमित शाह का हाथ मानते हैं. वो पूछते हैं कि अमित शाह आखिर करना क्या चाहते हैं? इस सवाल का जवाब नरेंद्र मोदी के 2013 में राष्ट्रीय नेता के तौर पर सामने आने के बाद, भारतीय समाज और राजनीति में आए बदलावों का विश्लेषण करने से मिल सकता है. आज के समय में भारतीय राजनीति पर नरेंद्र मोदी की पकड़ इतनी मजबूत है कि विश्लेषक सीधे 2030(अगर सब कुछ ऐसा ही रहता है) के बारे में सोच सकते हैं. यानि की अभी के बाद दो लोकसभा चुनाव तक बदलाव की कोई उम्मीद नहीं है. नरेंद्री मोदी लोकप्रियता के मामले में आज इंदिरा गांधी की बराबरी कर चुके हैं. लोकप्रियता के इस शिखर के बाद ये तय है कि वो पावर में रहें या न रहें लेकिन वो बीजेपी और संघ परिवार में शीर्ष पर रहेंगे. आज के हालात के हिसाब से नरेंद्र मोदी के पास अपना उत्तराधिकारी चुनने के लिए वीटो पावर होगा.

भारत जैसे देश में जहां राजनीति काफी हद तक बदल चुकी है, राजनीति में नैतिकता और पैसे की भूमिका बदल चुकी है. राष्ट्रीय नेता बनना आसान नहीं है और ये बात राहुल गांधी से बेहतर और कौन जान सकता है. ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, पिनराई विजयन और अमित शाह जैसे नेता इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं. आज के समय में जब हजारों लोग पूछते हैं कि 'अमित भाई कैसे हैं' तो अमित शाह तमाम लोगों से रेस में बहुत आगे निकल जाते हैं.

(लेख www.gulfnews.com पर छपे शीला भट्ट के लेख का हिंदी ट्रांसलेशन है)