असम के डिब्रूगढ़ के पास बनाए गए बोगीबील पुल का पीएम मोदी मंगलवार को उद्घाटन करेंगे.तिनसुकिया-नाहरलगुन इंटरसिटी एक्सप्रेस वो पहली ट्रेन होगी जो इस पुल से गुजरेगी.ये सप्ताह में पांच दिन चलेगी. इस पुल की मदद से असम के तिनसुकिया से अरूणाचल प्रदेश के नाहरलगुन कस्बे तक की रेलयात्रा में लगने वाले समय में 10 घंटे से अधिक की कमी आने की उम्मीद है.

कागजों पर इस पुल के बनने की शुरूआत 1985 में ही हो गई थी.तब असम समझौते के मुताबिक बोगीबील पुल को ब्रह्मपुत्र के ऊपर बनाने के लिए केंद्र सरकार ने सहमति जताई थी. हालांकि इसकी मंजूरी मिलने में 11 साल लगे और 1996 में इस योजना पर मुहर लगी. लेकिन पुल बनाने का 2002 में अटल बिहारी वाजपेई की सरकार ने शुरू किया था.खास बात ये है की अटल जी के जन्मदिन के मौके पर ही पीएम मोदी इसका उद्घाटन करेंगे. यूपीए सरकार ने 2007 में इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित कर दिया था. हालांकि भारत के सबसे लंबे और रणनीतिक तौर पर महत्त्वपूर्ण बोगीबील पुल का काम 2002 से शुरू होने के बाद काफी धीमा पड़ गया था. यूपीए सरकार ने 2007 में इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित कर दिया था.खास बात यह है कि कांग्रेस की सरकार ने 2009 में इसका उद्घाटन करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन यह हो न सका. 2014 में मोदी की सरकार बनने के बाद बोगीबील पुल पर तेजी से काम हुआ और अब इस पुल का उद्घाटन होने वाला है.

बोगिबील पुल की लम्बाई 4.94 किलोमीटर है.खास बात ये है की इस पर रेल लाइन और सड़के दोनों हैं.डबल डेकर यानि ऊपर और नीचे के दो हिस्सों में बने इस पुल के ऊपरी में हिस्से में जहां 3 लेन की सड़क है तो वहीं पुल के निचले हिस्से में 2 रेलवे ट्रैक हैं.रेलवे ट्रैक पर 100 किलोमीटर की रफ्तार से ट्रेन दौड़ सकेंगी.ब्रहम्पुत्र नदी की गहराई 62 मीटर तक धंसे 42 खंभो पर टिके इस पुल को बनाने में 5800 करोड़ की लागत आई है.भूंकप को ध्यान में रखते हुए इसे बनाया गया है जिसके कारण ये पुल 8 तीव्रता तक के भूंकप का सामना कर सकता है.इस पुल को बनाने में इंजीनियरों का अहम योगदान रहा है जिसके कारण इसे इंजीनियरिंग का तोहफा भी बताया जा रहा है.

दरसअल,आज के समय में जब चीन अपनी दादगिरी दुनिया में दिखा रहा है तब बोगिबील पुल की अपनी सामरिक अहमियत है.ये इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है ताकि 1962 की जैसी लड़ाई जैसा धोखा हमें फिर न मिल सके.उस वक्त चीन ने अरूणाचल प्रदेश की सीमा से लगे इलाकों पर कब्ज़ा करने के लिए भारत पर हमला कर दिया था. इस युद्ध के दौरान अगर चीन असम की तरफ रुख़ करता तो भारत के पास असम में ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर के इलाकों को बचा पाने का कोई भी विकल्प नहीं था. क्योंकि चीन को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए उन इलाकों तक पहुंचने का कोई साधन नहीं था.