अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आ गए हैं. जो बिडेन, डोनल्ड ट्रंप को हराकर अगले राष्ट्रपति चुने जा चुके हैं. आज से 6 महीने पहले तक कोई भी यह नहीं कह सकता था कि बिडेन ट्रंप को हरा पाएंगे. बिहार में भी चुनाव नतीजे आज आने वाले हैं. एक्जिट पोल की मानें तो बिहार में तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला गठबंधन चुनाव में जीत हासिल करने वाला है. अमेरिका की तरह बिहार में भी किसी ने बिल्कुल भी यह उम्मीद नहीं की होगी. लालू यादव के बगैर चुनाव में उतरी RJD की कमान तेजस्वी के हाथ में थी और नीतीश के आगे वो कहीं भी नजर नहीं आ रहे थे. लोग तेजस्वी यादव को हवा-हवाई वाले नेता के तौर पर देखते रहे जो विपक्ष के नेता की भूमिका में बिल्कुल भी फिट नहीं था.

जब लॉकडाउन के दौरान, तमाम मजदूर बिहार पैदल ही वापस लौट रहे थे तब तेजस्वी यादव दिल्ली में थे. उनका कहना था कि लॉकडाउन से पहले वो दिल्ली आ गए थे और वापस जाने के सभी साधन बंद हो गए. ऐसे में वो पटना कैसे लौटते. तमाम विरोधियों ने इसे लेकर तेजस्वी यादव पर निशाना साधा. एक तरफ तेजस्वी बतौर विपक्षी नेता असफल बताए जा रहे थे तो दूसरी तरफ नीतीश कुमार, कोरोना संकट के दौरान मजदूरों की वापसी से लेकर, बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर खासे निशाने पर रहे. ठीक एक साल पहले भी मुजफ्फपुर में चमकी बुखार से बच्चों की मौत के मामले में नीतीश कुमार बहुत बुरी तरह घिर चुकी थी. इसके अलावा, सृजन घोटाल और सबसे बड़ा मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड ने भी नीतीश की छवि को बड़ा नुकसान पहुंचाया. इस जघन्य अपराध में बिहार सरकार में मंत्री मंजू वर्मा के पति का नाम आया था जिसके बाद उनका इस्तीफा भी हुआ था. खास बात यह है कि इस चुनाव में मंजू वर्मा को जेडीयू ने फिर से टिकट दे दिया. इससे कहीं न कहीं नीतीश की मंशा पर सवाल खड़े हुए

2015 में चुनाव जीतने के बाद नीतीश कुमार ने पूरे बिहार में शराबबंदी करने का ऐलान किया. शराबबंदी का यह दावा भी फेल हुआ और तमाम मीडिया रिपोर्ट्स में देखने को मिला कि शराब की होम डिलीवरी जैसे सिस्टम भी बन गए हैं. पटना की बाढ़, प्रदेश की कानून व्यवस्था के बीच बड़बोले डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे के बयान, इन सब वजहों से पिछले 5 साल में नीतीश कुमार की विकास पुरुष की छवि को नुकसान पहुंचा. दूसरी तरफ तेजस्वी यादव भी कमजोर विपक्षी नेता के तौर पर जाने जाते रहे.

जब बिहार में चुनाव की चर्चाएं चालू हुईं तो लोगों ने कहा कि बिहार में विकल्पहीनता की स्थिति है और एक बार फिर नीतीश वापस आएंगे. चुनाव की शुरुआत और अब तक हालात ये बन चुके हैं, नीतीश के सत्ता से बाहर जाने की भविष्यवाणी तक की जा चुकी है. यहां मामला बड़ा सीधा है, दरअसल जनता नीतीश कुमार से इतना परेशान हो गई कि मजबूरी में उसने तेजस्वी के साथ जाने तक का मन बना लिया. दरअसल यह तेजस्वी की जीत नहीं, नीतीश की हार है. यहां संदेश, साफ तौर पर केंद्र सरकार और चेहरों के नाम पर चुनाव लड़ने वाले लोगों के लिए है. विकल्पहीनता की स्थिति का फायदा उठाकर आप जनता को उसके हाल पर नहीं छोड़ सकते. आपको काम हमेशा करना पड़ेगा. अगर आप विकल्पहीनता की बात करके अपने काम से भागेंगे तो खुद को और जनता दोनों का बड़ा नुकसान करवाएंगे.