यूपी और बिहार, देश के राजनीतिक तौर पर सबसे बड़े राज्य हैं. इन राज्यों ने देश को कई बड़े नेता दिए, प्रधानमंत्री दिए. अब जल्द ही बिहार की जनता अगले पांच साल के लिए अपने सीएम का चुनाव करने जा रही है. 10 नवबंर को ये पता चल जाएगा कि बिहार के सीएम की कुर्सी पर कौन बैठने वाला है या कौन नहीं बैठने वाला है. बिहार चुनाव से जुड़े कई ओपिनियन पोल में एनडीए को बहुमत मिलते दिखाया जा रहा है, फिर भी राजनीति का ऊंट किसी भी करवट बैठेगा, इसका पता किसी को नहीं है.

बिहार चुनाव की अब तक की कवरेज और खबरों से कई सवाल हैं-

1.नीतीश कुमार को लेकर जनता में नाराजगी है लेकिन वोट खिलाफ में पड़े इसकी गारंटी नहीं है

2. बीजेपी को लेकर जनता में नाराजगी नहीं है लेकिन बगैर नीतीश कितनी आगे बढ़ पाती ये बात शायद बीजेपी भी नहीं जानती

3. तेजस्वी यादव की सभाओं में भीड़ है लेकिन भीड़ वोट में तब्दील होगी या नहीं?

4. चिराग पासवान और पुष्पम प्रिया ने युवाओं को आकर्षित किया है लेकिन ये आकर्षण वोटों में कितना तब्दील होगा?

तमाम ओपिनियन पोल के मुताबिक एनडीए को बहुमत मिलने की बात की जा रही है. ऐसे में पहला सवाल और तीसरा सवाल बहुत ज़रूरी हो जाते हैं. 15 साल जब कोई पार्टी सत्ता में रहती है तो एक स्वाभाविक नाराजगी उसके खिलाफ होती ही है और फिर कोरोना काल में बिहार जिस बदहाली से गुजरा है उसमें तो नाराजगी होना लाज़िमी भी है. फिर भी ये बात सभी मानते हैं कि लालू के 15 साल के शासन के मुकाबले, नीतीश राज में बिहार में फिर भी शुकून था और यही वजह है कि नीतीश कुमार अपने काम के बजाय, लालू के 15 साल के खिलाफ वोट मांग रहे हैं. नीतीश कुमार को मर्यादित नेता माना जाता है. वो बहुत सोच-समझकर बोलते रहे हैं लेकिन इस बार वो लालू परिवार पर निजी हमले भी कर रहे हैं. ऐसे में कहीं न कहीं लगता है कि इस बार नीतीश कुमार में वो आत्मविश्वास नहीं है जिसके साथ उन्होंने पिछले चुनाव में पीएम मोदी को चुनौती दे डाली थी. लोगों की नाराजगी, नीतीश कुमार की इस कमजोर आत्मविश्वास की वजह हो सकती है. दूसरी तरफ तेजस्वी यादव की सभाओं में भारी भीड़ हो रही है. उनके समर्थक, तेजस्वी की जीत होने का दावा कर रहे हैं. फिर भी भीड़ से इतर अगर, पत्रकारों से लोगों की बातचीत को देखें तो उसमें तेजस्वी का नाम लेने वालों की संख्या बहुत कम है. खासतौर पर युवाओं में ये आंकड़ा बहुत अलग है. अगर युवाओं की बात करें तो चिराग पासवान और पुष्पम प्रिया का नाम सुनाई पड़ता है.

पुष्पम प्रिया की पार्टी नई है. कोई कैडर नही है, उसे सियासत में जगह बनाने में वक्त लगेगा लेकिन चिराग पासवान के पास एक वोट बैंक भी है और वो युवाओं में लोकप्रिय भी हैं. अब बात करते हैं बीजेपी की, तो बीजेपी को लेकर नाराजगी कहीं दिखाई नहीं पड़ती. ऐसे में बीजेपी अपनी सीटों पर सही चुनाव लड़ते नजर आ रही है. इसके अलावा दो और गठबंधन मैदान में हैं. ये गठबंधन, आरएलएसपी-बीएसपी-एआईएमआईएम और जजपा-भीम आर्मी और प्रकाश आंबेडकर की पार्टी के हैं. इन गठबंधनों में जितना वोट जाएगा वो सीधे तौर पर आरजेडी और कांग्रेस का नुकसान होगा. अब सवाल उठता है कि नीतीश से नाराज जनता, जेडीयू वाली सीटों पर किसको वोट देगी? वैसे तो ऐसे वोट मुख्य विपक्षी यानि RJD को जाते लेकिन अभी देखकर लगता है कि ये वोट एलजेपी और आरजेडी में बटेंगे. ऐसे में तेजस्वी यादव राह सबसे ज्यादा कठिन है.

कुल मिलाकर, ये पूरी पिक्चर बड़ी जटिल है फिलहाल बीजेपी सत्ता में वापसी करती दिख रही है लेकिन उसका सहयोगी कौन होगा और सीएम कौन होगा, ये चुनाव के नतीजे आने पर ही पता चलेगा.