बिहार, भारत की सियासत का एक बड़ा केंद्र रहा है. इस राज्य ने देश को तमाम नेता, IAS ,PCS दिए हैं. अब से कुछ दिनों बाद चंद्रगुप्त मौर्य की धरती वाला ये राज्य एक बार फिर से सत्ता पर बैठने वाले लोगों का चुनाव करेगा. यूपी की सियासत को टेढ़ा माना जाता रहा है लेकिन बिहार की सियासत तो बहुत ही ज्यादा टेढ़ी नजर आ रही है. तमाम गठबंधन हैं, लोग व्यंग में कहने लगे हैं कि अगर पटना में पत्थर उछालो तो किसी सीएम उम्मीदवार को ही लगेगा. सीएम नीतीश कुमार मैदान में हैं ही. तेजस्वी यादव महागठबंधन के सीएम उम्मीदवार हैं, इसके अलावा, RLSP के उपेंद्र कुशवाहा भी सीएम की कुर्सी पर दावा ठोक रहे हैं.

मुद्दों की बात करें तो मुद्दा सुशांत सिंह राजपूत की मौत भी है. सत्ताधारी गठबंधन ने इस मुद्दे पर काफी जोर लगाया है और खास बात ये है कि किसी भी विपक्षी पार्टी ने इसे नकारा भी नहीं है. सभी के सुर इस मामले में एक जैसे हैं. जजपा जैसी छोटी पार्टी भी सुशांत सिंह को बिहार का बेटा बता रही है. वो अलग बात है कि बिहार के तमाम लोग शायद न जानते हों कि सुशांत खुद को बिहार का बताने से बचने की कोशिश करते थे (वरिष्ठ पत्रकार अजय ब्रह्नात्मज ने यह दावा किया है). कोरोना के दौरान मजदूरों और अस्पतालों की बदहाली, बड़ा मुद्दा होनी चाहिए थी. हालांकि, इस बदहाली की कोई चर्चा अभी नहीं है. खास बात ये है कि ये बदहाली अब भी बदस्तूर जारी है. अस्पतालों में लोगों को बेड नहीं मिल रहे, इलाज नहीं हो पा रहा लेकिन सत्ता पर कौन बैठेगा, ये तय करने के मुद्दे कुछ और ही हैं.

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM लोकसभा चुनाव की तरह एक बार फिर से मैदान में है. ओवैसी मुसलमानों के मुद्दों को बेहद फैक्ट के साथ और प्रभावशाली तरीके से रखते हैं. मुस्लिमों की रहनुमाई का दावा करने वाले सभी दलों में शायद ही कोई इतनी बेहतर तरीके से मुसलमानों के मुद्दों को रखता हो. हालांकि, फिर भी ओवैसी को वोटकटवा और बीजेपी का दांव कहा जाता है. सोशल मीडिया पर भी ओवैसी को मुस्लिमों का अच्छा खासा समर्थन मिलता है. इस बार ओवैसी RLSP और BSP के साथ, गठबंधन करके मैदान में हैं. वैसे तो नतीजे चुनाव बाद ही चलेंगे लेकिन भारत के मुसलमानों की वोटिंग का एक सेट पैटर्न है. वो सीधे तौर पर उसे वोट करते हैं जो उन्हें बीजेपी को हराने में सक्षम दिखता है. तमाम खूबियों के बावजूद ओवैसी और उनका गठबंधन ऐसा करने में सक्षम नहीं नजर आता. ऐसे में अधिकतर मुसलमानों के RJD-कांग्रेस गठबंधन के साथ जाने की उम्मीद है. ओवैसी और उनका गठबंधन वोट कटवा की भूमिका में ही नजर आएगा.

तमाम पत्रकारों की मानें तो बीजेपी की हालत जेडीयू से मजबूत है, लेकिन नेताओं के चलते बीजेपी मजबूर है. इतने सालों में बीजेपी, नीतीश कुमार का एक भी विकल्प ढूंढ नहीं पाई है. सुशील मोदी की हालत तो ऐसी है कि उनका अस्तित्व ही नीतीश के सीएम बने रहने पर टिका है. शायद उनकी पार्टी का कोई सीएम बने, तो वो उतने भी प्रभावशाली न रह जाएं जितने अभी हैं. राजनीति में लंबा वक्त गुजारने के बावजूद वो आज भी बचकाने बयान देते नजर आते हैं. बाकी नेताओं में नित्यानंद राय जैसे नेता हैं जो नीतीश के आगे कहीं नजर नहीं आते. दूसरी तरफ नीतीश की पार्टी कमजोर है. खुद नीतीश भी पिछले दिनों सरकार की कार्यशाली के चलते निशाने पर रहे हैं पर फिर भी उनके आगे कहीं कोई नजर नहीं आता. तेजस्वी यादव अनुभव में नीतीश के आगे कमजोर तो हैं ही साथ ही, राजनीतिक कुशलता में भी कमजोर नजर आते हैं. वो लालू यादव की विरासत पर राजनीति भी करते हैं और अपने माता-पिता के 15 साल के कार्यकाल में हुई गलतियों के लिए माफी भी मांगते हैं. ये अलग ही तरह का विरोधाभास है जिससे किसी भी पार्टी को बचना चाहिए.

2015 के विधानसभा चुनाव को याद करिए. बीजेपी बनाम लालू-नीतीश का महागठबंधन. बीजेपी बहुत ही जोर-शोर से प्रचार कर रही थी और उसके समर्थक भी जीत की उम्मीद लगाए बैठे थे. दिल्ली के पत्रकार, बिहार में ग्राउंड रिपोर्टिंग करते नजर आ रहे थे. इस बार बिहार चुनाव का रंग फीका है. लालू यादव चुनाव से गायब हैं और अधिकतर लोगों का कहना है कि बीजेपी-जेडीयू का गठबंधन आराम से जीतने वाला है लेकिन राजनीति बड़ी अप्रत्याशित है. आज के समय में भारत की राजनीति में अधिकतर दो काम होते हैं. या तो बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिल जाता है और या तो जोड़ तोड़ शुरु हो जाता है. इस बार का बिहार चुनाव देखकर लगता है कि ऐक्शन चुनाव के बाद शुरु होने वाला है. सब कुछ तय होकर भी कुछ तय नहीं नजर आ रहा है. हालांकि, इस सबमें जनता को क्या मिलने वाला है, ये तय नजर आता है. मुझे लगता है कि जनता को सिर्फ राजनीतिक मनोरंजन मिलने वाला है और कुछ नहीं. तो शांति से लोकतंत्र के इस अद्भुत मेले को देखिए, जिसमें शायद आपको जल्द ही MLA बिकते नजर आएं.