अमित शाह को मुख्यता अपनी राजनीतिक सूझ बूझ और कुशल पार्टी प्रबंधन के लिए जाना जाता है। पिछले कई सालों में चुनाव को कैसे लड़ना है और उसे जीतने के लिए हर मुमकिन कोशिश करना, अगर कोई व्यक्ति सीखना चाहता है तो अमित शाह से बेहतरीन इसका कोई उदहारण नही हो सकता। अमित शाह और मोदी की जोड़ी ने बीजेपी को चुनाव जीतने की मशीन में बदल दिया है।

वैसे तो बीजेपी में पुराने समय से अच्छे वक्ता रहे है। प्रधानमंत्री मोदी खुद अपने भाषण देने की कला और भाषण के माध्यम से लोगों से जुड़ने के लिए जाने जाते है। 2014 के लोकसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव के बीच के समय में अमित शाह को ज्यादातर लोग संगठन के लिए काम करने वाला और चुनाव प्रबंधन का माहिर खिलाड़ी के तौर पर देखते है। 2019 चुनाव से पहले जिस तरह से अमित शाह राज्य सभा में आये और फिर लोक सभा चुनाव जीतकर देश के गृह मंत्री बने, उन्होंने संसदीय राजनीति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। जब वो 2017 में राज्य सभा के लिए चुने गए तो इसे आप अमित शाह का दिल्ली की संसदीय राजनीति का ट्रेनिंग पीरियड समझ सकते है।

उसके बाद जिस आक्रामक तरीके से वो विपक्ष को अपनी वाक्पटुता और तर्कों से घेर कर रखते है उसका जवाब मौजूदा समय में विपक्ष के पास नजर नही आता। तमाम ऐसे क्षण आये जब अमित शाह ने गुस्से और बेहद तीखे तरीके से विपक्ष पर हमला किया। और ज्यादातर मौके पर ऐसा देखा गया की विपक्षी सांसद इस तरह से दुबक जाते है जैसे स्कूल में कठोर शिक्षक की मार से घबराकर बच्चे सीट के पीछे दुबके बैठे रहते है।

जब योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चुन कर आये थे तब बहुत से लोगों ने उन्हें मोदी के उत्तराधिकारी के तौर पर देखना शुरू कर दिया था। पर अमित शाह ने जिस तरह से एक कठोर प्रशासक और कट्टर राष्ट्रवादी छवि बनायीं है वो बीजेपी के दूसरे नेताओं से कंही आगे निकल चुके है। जिस तरह से अमित शाह ने अडवाणी की सीट से चुनाव लड़ा और जीता और फिर गृह मंत्री बने और अब लोकसभा में जिस तरह से वो जवाब देते है या जो भाषण देते है उसे सुन कर अगर ये कहा जाये की भविष्य में जब भी मोदी के उत्तराधिकारी की तौर पर किसी नेता की तलाश की जाएगी तो वो अमित शाह की अलावा दूसरा कोई नही होगा।